राजस्थान में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्य विधानसभा ने सोमवार को राजस्थान आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा विश्वविद्यालय अजमेर विधेयक-2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस विधेयक के पारित होने के साथ ही अजमेर में एक नए राजकीय विश्वविद्यालय की स्थापना का रास्ता साफ हो गया है।
विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने इसे अजमेर के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि लगभग 38 वर्षों के बाद शहर को दूसरा राजकीय विश्वविद्यालय मिल रहा है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में यह पहल संभव हो सकी है और इससे उनका लंबे समय से जुड़ा सपना भी पूरा हुआ है।
पारंपरिक चिकित्सा को मिलेगा नया संस्थागत आधार
सदन में इस विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए उपमुख्यमंत्री एवं आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा मंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा ने कहा कि राज्य सरकार पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को मजबूत करने के लिए गंभीरता से काम कर रही है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी जैसी भारतीय चिकित्सा प्रणालियां देश की समृद्ध परंपरा का हिस्सा हैं और इन्हें आधुनिक शिक्षा व अनुसंधान से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
डॉ. बैरवा के अनुसार अजमेर में इस विश्वविद्यालय की स्थापना राज्य के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक पहल है। इससे न केवल चिकित्सा शिक्षा को नया आयाम मिलेगा, बल्कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के विकास और विस्तार को भी गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य ‘स्वस्थ राजस्थान से समृद्ध राजस्थान’ के लक्ष्य को हासिल करना है और यह विश्वविद्यालय उस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
उच्च शिक्षा और अनुसंधान को मिलेगा प्रोत्साहन
उपमुख्यमंत्री ने बताया कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा बजट वर्ष 2024-25 में की गई थी। अब विधेयक पारित होने के बाद जल्द ही इसकी अधिसूचना जारी की जाएगी। विश्वविद्यालय के शुरू होने से आयुष से जुड़े विषयों में उच्च शिक्षा और शोध की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध होंगी। उन्होंने कहा कि यह संस्थान विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों के लिए उत्कृष्ट अनुसंधान का केंद्र बनेगा। यहां पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के साथ-साथ आधुनिक शोध पद्धतियों को भी जोड़ा जाएगा, जिससे चिकित्सा के भारतीय स्वरूप को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल सके।
आयुष चिकित्सा पद्धतियों को मिलेगा बढ़ावा
इस विश्वविद्यालय के माध्यम से आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी और होम्योपैथी जैसी चिकित्सा प्रणालियों को विशेष रूप से बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अलावा भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से जुड़े नए आविष्कारों और अनुसंधानों को भी शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया जाएगा। डॉ. बैरवा ने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल शिक्षा प्रदान करना नहीं होगा, बल्कि पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में नवाचार और शोध को भी प्रोत्साहित करना होगा। इससे आयुष क्षेत्र में नई संभावनाएं खुलेंगी और राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती मिलेगी।
विश्वविद्यालय की संरचना और प्रशासनिक व्यवस्था
पारित अधिनियम के अनुसार विश्वविद्यालय में विभिन्न प्रशासनिक और शैक्षणिक निकायों का गठन किया जाएगा। इनमें प्रबंध बोर्ड, विद्या परिषद, अध्ययन समिति, वित्त और लेखा समिति, अनुसंधान बोर्ड, खेल एवं छात्र कल्याण बोर्ड तथा नवाचार बोर्ड शामिल होंगे। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति द्वारा कुलगुरु की नियुक्ति की जाएगी और उसके बाद प्रबंध बोर्ड का गठन किया जाएगा। यह बोर्ड विश्वविद्यालय के संचालन और नीतिगत निर्णयों के लिए जिम्मेदार होगा।
विभिन्न संकायों में होगी पढ़ाई
विश्वविद्यालय के अंतर्गत कई संकाय स्थापित किए जाएंगे। इनमें आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसे विषयों में अध्ययन कराया जाएगा। इसके अलावा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप अन्य नए संकाय भी शुरू किए जा सकते हैं। सरकार का मानना है कि इन विषयों में शिक्षा और शोध को संस्थागत रूप देने से देश की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को नई पहचान मिलेगी और युवा पीढ़ी भी इन क्षेत्रों की ओर आकर्षित होगी।
विश्वविद्यालय के लिए भूमि आवंटित
इस नए विश्वविद्यालय के लिए भूमि भी निर्धारित कर दी गई है। उपमुख्यमंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा ने बताया कि महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर की भूमि में से 11.93 हेक्टेयर क्षेत्र इस विश्वविद्यालय के लिए आवंटित किया गया है। इस भूमि पर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक भवन, शोध केंद्र, प्रशासनिक कार्यालय और अन्य आवश्यक सुविधाओं का विकास किया जाएगा। आने वाले समय में यहां आधुनिक सुविधाओं से युक्त शैक्षणिक परिसर तैयार किया जाएगा।
अजमेर के लिए बड़ी शैक्षणिक उपलब्धि
राजस्थान विधानसभा में विधेयक पारित होने के बाद अजमेर के लिए यह एक बड़ी शैक्षणिक उपलब्धि मानी जा रही है। इससे शहर की पहचान एक महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र के रूप में और मजबूत होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विश्वविद्यालय के शुरू होने से आयुष चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा मिलेगी और राजस्थान इस क्षेत्र में देश के प्रमुख राज्यों में शामिल हो सकता है। साथ ही इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और शोध के नए अवसर भी पैदा होंगे।


