बाड़मेर जिले के कवास क्षेत्र में किसान के खेत से लगातार हो रहे क्रूड ऑयल रिसाव का मामला अब राजस्थान विधानसभा तक पहुंच गया है। काऊ का खेड़ा गांव स्थित ऐश्वर्या ऑयल फील्ड के वेलपैड नंबर-8 के पास हुए इस रिसाव ने किसानों की कृषि भूमि और पर्यावरण को गंभीर नुकसान की आशंका में डाल दिया है। तीन दिन तक चले अनियंत्रित रिसाव ने स्थानीय ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है और प्रशासन व तेल कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह मामला बाड़मेर से विधायक डॉ. प्रियंका चौधरी ने विधानसभा में प्रमुखता से उठाया। उन्होंने सदन को बताया कि कवास क्षेत्र में लगातार हो रही ब्लास्टिंग और तेल कंपनियों की गतिविधियों के कारण गांवों के किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। विधायक ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप और प्रभावित किसानों को शीघ्र मुआवजा देने की मांग की।
23 फरवरी को अचानक फूटा तेल का फव्वारा
जानकारी के अनुसार 23 फरवरी को दोपहर करीब 12 बजे किसान हरजीराम खोथ अपने खेत में काम कर रहे थे, तभी अचानक जमीन के भीतर से कच्चे तेल का फव्वारा फूट पड़ा। कुछ ही समय में खेत और आसपास का इलाका तीखी तेल गंध से भर गया। यह खेत केयर्न वेदांता की ऐश्वर्या ऑयल फील्ड के बेहद नजदीक स्थित है, जिससे पाइपलाइन लीकेज या भूमिगत दबाव के कारण रिसाव की आशंका जताई जा रही है।
घटना के बाद ग्रामीणों में अफरा-तफरी मच गई। किसानों को डर है कि तेल के फैलाव से उनकी उपजाऊ भूमि लंबे समय तक बंजर हो सकती है। स्थानीय लोगों ने प्रशासन और कंपनी को तत्काल सूचना दी, जिसके बाद तकनीकी टीम मौके पर पहुंची।
50 से अधिक टैंकर क्रूड ऑयल निकाला गया
रिसाव को नियंत्रित करने के लिए कंपनी ने खेत के चारों ओर लगभग 100 मीटर लंबी खाई खुदवाई, ताकि तेल का फैलाव सीमित किया जा सके। वैक्यूम पंपों की सहायता से अब तक 50 से अधिक टैंकर क्रूड ऑयल निकाला जा चुका है। एहतियात के तौर पर आसपास की कुछ पाइपलाइनों की सप्लाई भी अस्थायी रूप से बंद कर दी गई है।
हालांकि तीन दिन बीत जाने के बाद भी रिसाव के सटीक कारणों का स्पष्ट खुलासा नहीं हो सका है। विशेषज्ञों की टीम जांच में जुटी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या नियमित सुरक्षा निरीक्षण और रखरखाव में कोई कमी रही है।
पर्यावरण और कृषि पर संभावित प्रभाव
कच्चे तेल का सीधे कृषि भूमि में रिसाव होना पर्यावरणीय दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है। क्रूड ऑयल में मौजूद हाइड्रोकार्बन मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित कर सकते हैं और भूजल स्रोतों तक भी पहुंच सकते हैं। यदि समय रहते वैज्ञानिक तरीके से सफाई और उपचार नहीं किया गया, तो यह क्षेत्र की खेती और जैव विविधता पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है। किसानों का कहना है कि उनकी जमीन ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। यदि मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो जाती है, तो आने वाले कई वर्षों तक उत्पादन प्रभावित रह सकता है।
विधायक की मांग और सरकार से अपील
विधानसभा में मुद्दा उठाते हुए विधायक डॉ. प्रियंका चौधरी ने कहा कि क्रूड ऑयल रिसाव को पूरी तरह और तत्काल रोका जाए। उन्होंने मांग की कि प्रभावित भूमि का वैज्ञानिक आकलन कर नुकसान की भरपाई की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि औद्योगिक गतिविधियों से होने वाली लापरवाही का खामियाजा किसानों को नहीं भुगतना चाहिए। विधायक ने सरकार से यह भी आग्रह किया कि तेल कंपनियों की सुरक्षा प्रणाली और पर्यावरणीय मानकों की समीक्षा की जाए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है, तो जिम्मेदारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
प्रशासन और कंपनी पर उठते सवाल
इस घटना ने प्रशासन और कंपनी की आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि रिसाव तीन दिन तक जारी रहा, तो इसका अर्थ है कि समस्या को नियंत्रित करने में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई गई। ग्रामीणों और किसान संगठनों ने मांग की है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए नियमित पाइपलाइन निरीक्षण, सुरक्षा ऑडिट और सामुदायिक निगरानी व्यवस्था लागू की जाए।
राहत और समाधान की उम्मीद
सदन में मामला उठने के बाद क्षेत्र के किसानों को उम्मीद है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से लेगी। वे चाहते हैं कि प्रभावित परिवारों को त्वरित राहत पैकेज दिया जाए और भूमि की पुनर्स्थापना के लिए वैज्ञानिक उपाय किए जाएं। कवास क्षेत्र की यह घटना केवल एक स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि यह औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन का बड़ा सवाल भी खड़ा करती है। आने वाले दिनों में सरकार और संबंधित एजेंसियों की कार्रवाई यह तय करेगी कि किसानों का भरोसा किस हद तक बहाल हो पाता है और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए कितने प्रभावी कदम उठाए जाते हैं।


