भारत सरकार की केंद्रीय कैबिनेट ने मंगलवार, 24 फरवरी को एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए राज्य केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह निर्णय लंबे समय से चल रही उस मांग का परिणाम है, जिसमें कहा जा रहा था कि मलयालम भाषा में राज्य का मूल नाम ‘केरलम’ है, जबकि संविधान और आधिकारिक दस्तावेजों में अंग्रेजी शैली के अनुसार ‘केरल’ दर्ज है। इस फैसले के बाद राजनीतिक और सामाजिक बहसें तेज हो गई हैं। कांग्रेस नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने इस पर तंज कसा, जबकि भाजपा और वाम दलों के नेताओं ने इसे सांस्कृतिक पहचान को सशक्त करने वाला कदम बताया।
अब आम जनता और राजनीतिक विशेषज्ञों के मन में सवाल है—क्या यह सिर्फ नाम बदलने का मामला है या इसके पीछे कोई गहरी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है? नाम परिवर्तन की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी? और सबसे बड़ा प्रश्न—केरल का नाम ‘केरलम’ क्यों रखा जा रहा है?
केरल के अलग राज्य बनने का इतिहास
आधुनिक केरल का इतिहास भाषाई आंदोलनों से गहराई से जुड़ा हुआ है। ब्रिटिश शासनकाल में भारत को भाषाई आधार पर नहीं बांटा गया था, लेकिन दक्षिण भारत में विशेष रूप से मद्रास प्रेजिडेंसी में भाषाई पहचान को लेकर आंदोलन लंबे समय से चल रहे थे।
1920 के दशक में संयुक्त मलयालम भाषी राज्य बनाने की मांग ने गति पकड़ी। इस अवधारणा में त्रावणकोर और कोचीन की रियासतों के साथ मद्रास प्रेजिडेंसी के मालाबार जिले को जोड़ने की कल्पना की गई थी। यह आंदोलन कई दशकों तक बढ़ता रहा और स्वतंत्रता के बाद इस दिशा में तेजी से कदम उठाए गए।
1 जुलाई 1949 को त्रावणकोर और कोचीन के विलय से त्रावणकोर-कोचीन राज्य का गठन हुआ। इसके बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना हुई, जिसकी अध्यक्षता सैयद फजल अली ने की। आयोग ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की, जिसके तहत मलयालम भाषी क्षेत्रों को एकीकृत कर नया राज्य बनाने का सुझाव दिया गया।
इस सिफारिश के अनुसार, मालाबार जिला और कासरगोड तालुका को इस नए राज्य में शामिल किया गया। वहीं त्रावणकोर के चार दक्षिणी तालुकों—तोवला, अगस्त्येश्वरम, कालकुलम और विलायनकोड—के साथ शेनकोट्टई के कुछ हिस्सों को तमिलनाडु में मिलाया गया। अंततः 1 नवंबर 1956 को आधुनिक केरल राज्य का आधिकारिक गठन हुआ। इस दिन को आज भी केरल पिरवी के रूप में मनाया जाता है।
क्यों उठी केरल का नाम बदलकर केरलम करने की मांग?
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें
नाम परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण आधार इसका ऐतिहासिक स्वरूप है। ‘केरल’ वास्तव में मलयालम शब्द ‘केरलम’ का ही अंग्रेजी रूपांतरण है। इसका उल्लेख लगभग 257 ईसा पूर्व सम्राट अशोक के शिलालेखों में मिलता है, जहाँ इसे ‘केतलपुत्र’ कहा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान चेर साम्राज्य से जुड़ी हुई है।
भाषाई पहचान और उच्चारण
मलयालम भाषा में राज्य का सही उच्चारण ‘केरलम’ है। लेकिन अंग्रेजी प्रशासनिक व्यवस्था के कारण इसे ‘Kerala’ दर्ज किया गया। यह अंग्रेजीकृत संस्करण आज तक संविधान और आधिकारिक दस्तावेजों में बना हुआ है।
भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर राज्य सरकार ने तर्क दिया है कि जब जनता अपनी भाषा और परंपरा में इसे ‘केरलम’ कहती है, तो आधिकारिक दस्तावेजों में भी यही नाम होना चाहिए।
संविधान में बदलाव की मांग
जून 2024 में केरल विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें कहा गया कि राज्य की मूल पहचान ‘केरलम’ ही है। इसलिए संविधान की पहली अनुसूची और आठवीं अनुसूची में संशोधन कर राज्य का आधिकारिक नाम ‘केरलम’ किया जाना चाहिए। यह प्रस्ताव पहली बार 2023 में लाया गया था लेकिन तकनीकी कमियों को दूर करने के लिए इसे दोबारा संशोधित कर पारित किया गया।
केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद आगे क्या प्रक्रिया होगी?
राज्य के नाम को बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया अनुच्छेद 3 के तहत आती है। यह प्रक्रिया कई चरणों में आगे बढ़ती है।
राज्य विधानसभा का प्रस्ताव
केरल विधानसभा पहले ही सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेज चुकी है। यह पहला औपचारिक कदम था।
केंद्रीय कैबिनेट की स्वीकृति
प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई, जिससे प्रक्रिया का दूसरा चरण पूरा हो गया।
केंद्र सरकार विधेयक का मसौदा तैयार करेगी
अब केंद्र सरकार एक विशेष विधेयक तैयार करेगी जिसे संभवतः ‘केरलम नाम परिवर्तन विधेयक’ कहा जाएगा।
राष्ट्रपति की सिफारिश
अनुच्छेद 3 के अनुसार, विधेयक सिर्फ राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है। राष्ट्रपति इसे केरल विधानसभा को उनकी राय जानने के लिए भेजेंगे। हालांकि, राज्य की राय संसद पर बाध्यकारी नहीं होती।
संसद में विधेयक पारित होना
संसद में इस विधेयक को साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है। राज्य के नाम बदलने के लिए किसी विशेष बहुमत या संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि अनुच्छेद 4 इसे अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर रखता है।
राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी और अधिसूचना
दोनों सदनों से पारित होने पर विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। मंजूरी मिलते ही इसे भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा। उसी दिन से ‘केरलम’ भारत के आधिकारिक मानचित्र पर राज्य का नया नाम बन जाएगा।
संविधान की अनुसूचियों में बदलाव
राजपत्र में अधिसूचना के बाद—
पहली अनुसूची (राज्यों के नाम)
चौथी अनुसूची (राज्यसभा सीट आवंटन)
स्वतः अपडेट हो जाएंगी, और सभी कानूनी दस्तावेज, अंतरराष्ट्रीय समझौते और सरकारी रिकॉर्ड में राज्य का नाम ‘केरलम’ दर्ज होगा।


