देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI को लेकर बढ़ती सक्रियता के बीच राजस्थान ने प्रशासनिक और कानून व्यवस्था के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहल की है। दिल्ली में आयोजित एआई समिट 2026 के बाद देशभर में एआई आधारित नवाचारों की चर्चा तेज हुई है। इसी क्रम में राजस्थान के सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग ने कंप्यूटर विजन आधारित फेस सिमिलैरिटी सर्च सिस्टम को सफलतापूर्वक लागू कर नई मिसाल पेश की है। यह प्रणाली न केवल अपराधियों की पहचान को आसान बना रही है, बल्कि सरकारी भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने में भी अहम भूमिका निभा रही है।
फेस सिमिलैरिटी सर्च सिस्टम कैसे करता है काम
सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग के सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट सेंटर द्वारा विकसित यह एआई आधारित प्रणाली उन्नत कंप्यूटर विजन तकनीक पर आधारित है। विभाग के आयुक्त हिमांशु गुप्ता के अनुसार, इस समाधान की श्रृंखला को राज्यभर में तैनात किया जा चुका है। यह सिस्टम संदिग्ध व्यक्ति की तस्वीर को विशाल डिजिटल डेटाबेस से मिलान कर उसकी पहचान की पुष्टि करता है।
सरकारी भर्ती परीक्षाओं के संदर्भ में यह एप्लिकेशन लगभग 50 लाख पंजीकृत अभ्यर्थियों के रिकॉर्ड वाले डेटाबेस से संदिग्ध उम्मीदवार की फोटो का मिलान कर सकता है। उच्च-सटीकता एल्गोरिद्म के माध्यम से यह संभावित डमी कैंडिडेट के मामलों की पहचान करता है। इससे भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।
डमी कैंडिडेट पर सख्त निगरानी
राजस्थान में समय-समय पर प्रतियोगी परीक्षाओं में डमी उम्मीदवारों के मामलों ने प्रशासन के सामने चुनौती खड़ी की है। ऐसे मामलों में वास्तविक अभ्यर्थी की जगह किसी अन्य व्यक्ति के परीक्षा देने की शिकायतें सामने आती रही हैं। एआई संचालित फेस सिमिलैरिटी सर्च सिस्टम इस समस्या का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है।
परीक्षा केंद्र पर ली गई फोटो को पंजीकृत डेटाबेस से मिलाया जाता है। यदि फोटो में असमानता पाई जाती है तो संबंधित एजेंसियों को तत्काल सूचना मिल जाती है। इससे न केवल परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित होती है, बल्कि भविष्य में इस प्रकार के प्रयासों पर भी अंकुश लगता है। प्रशासनिक स्तर पर यह पहल भर्ती तंत्र की विश्वसनीयता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
अपराध जांच में AI तकनीक की भूमिका
यह एआई प्रणाली केवल परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में भी सहायक सिद्ध हो रही है। प्रदेश के आपराधिक डेटाबेस में लगभग 10 लाख फोटो रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। किसी भी संदिग्ध या गिरफ्तार आरोपी की तस्वीर को इन रिकॉर्ड से मिलाकर उसकी पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि का पता लगाया जा सकता है।
इस तकनीक से आदतन अपराधियों की पहचान, पैटर्न विश्लेषण और निगरानी की प्रक्रिया तेज हुई है। पुलिस को जांच के दौरान त्वरित और सटीक जानकारी प्राप्त होती है, जिससे अपराधों की कड़ियों को जोड़ने में आसानी होती है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह प्रणाली अपराध नियंत्रण में समय और संसाधनों दोनों की बचत कर रही है।
लावारिस शवों की पहचान में मानवीय पहल
एआई आधारित फेस सिमिलैरिटी सर्च समाधान का एक महत्वपूर्ण मानवीय पहलू भी सामने आया है। लावारिस शवों की पहचान अक्सर प्रशासन और परिवारों दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण होती है। अब इस प्रणाली के माध्यम से अज्ञात शवों की तस्वीरों का मिलान गुमशुदा व्यक्तियों और अन्य संबंधित डेटाबेस से किया जा सकता है।
इस प्रक्रिया से कई मामलों में पहचान स्थापित करने में सफलता मिली है। इससे परिजनों को अपने प्रियजनों के बारे में जानकारी मिल पाती है और प्रशासन को कानूनी प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने में सुविधा होती है। यह पहल तकनीक को जनसेवा के साथ जोड़ने का प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत करती है।
सार्वजनिक सेवा वितरण में सुधार
राजस्थान सरकार का यह कदम केवल अपराध नियंत्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक सेवा वितरण प्रणाली को भी अधिक कुशल और पारदर्शी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। डिजिटल रिकॉर्ड, एआई एल्गोरिद्म और उन्नत डेटा प्रोसेसिंग के संयोजन से प्रशासनिक कार्यों में गति आई है।
भविष्य में इस तकनीक के और अधिक विभागों में विस्तार की संभावना जताई जा रही है। यदि इसी प्रकार तकनीक का समुचित उपयोग जारी रहा तो राजस्थान प्रशासनिक सुधारों और डिजिटल गवर्नेंस के क्षेत्र में अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकता है।
तकनीकी सशक्तिकरण की दिशा में राजस्थान
एआई आधारित फेस सिमिलैरिटी सर्च सिस्टम राजस्थान के डिजिटल परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभरा है। अपराधियों की त्वरित पहचान, भर्ती परीक्षाओं में डमी उम्मीदवारों पर रोक और लावारिस शवों की शिनाख्त जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में यह प्रणाली प्रभावी सिद्ध हो रही है।
तेजी से बदलते तकनीकी परिदृश्य में यह पहल दर्शाती है कि राज्य सरकार आधुनिक तकनीक को प्रशासनिक ढांचे में समाहित कर नागरिक सुरक्षा और पारदर्शिता को प्राथमिकता दे रही है। आने वाले समय में यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी मार्गदर्शक साबित हो सकता है।


