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रमज़ान में जयपुर में लाउडस्पीकर विवाद फिर गरमाया, भाजपा–कांग्रेस आमने-सामने

रमज़ान में जयपुर में लाउडस्पीकर विवाद फिर गरमाया, भाजपा–कांग्रेस आमने-सामने

राजस्थान की राजधानी जयपुर में रमज़ान के महीने के दौरान लाउडस्पीकर का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। हवामहल विधानसभा सीट से भाजपा विधायक बालमुकुंद आचार्य  द्वारा यह मुद्दा उठाए जाने के बाद अब सिविल लाइंस सीट से भाजपा विधायक गोपाल शर्मा ने भी लाउडस्पीकर सीमित करने की मांग को जोरदार तरीके से सामने रखा है। उनके बयान ने इस विवाद में नई तीव्रता जोड़ दी है, जिसके बाद सियासी प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं।

गोपाल शर्मा ने क्यों उठाई लाउडस्पीकर बंद करने की मांग

सिविल लाइंस से भाजपा विधायक गोपाल शर्मा ने यह कहते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई कि किसी भी धर्मग्रंथ में अत्यधिक शोर मचाने या लाउडस्पीकर बजाने का उल्लेख नहीं है। उनके अनुसार धार्मिक गतिविधियों के लिए ऊँचे ध्वनि स्तर की कोई अनिवार्यता नहीं है और कई स्थानों पर लोग केवल अपनी “जिद” के कारण तेज आवाज़ में लाउडस्पीकर बजाते हैं, जिससे आम नागरिकों को असुविधा होती है।

उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकर का लगातार उपयोग बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान पैदा करता है। साथ ही बुजुर्गों और बीमार लोगों को भी इससे परेशानी उठानी पड़ती है। शर्मा ने यह अपेक्षा जताई कि लोग स्वयं जागरूकता दिखाते हुए ऐसी गतिविधियों से बचें, जिनसे दूसरे नागरिकों को असुविधा उठानी पड़े। उनके अनुसार धार्मिक आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन यह भी आवश्यक है कि उस आस्था की अभिव्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों का हनन न करे।

‘हिंदू धर्म में कभी-कभार और क्षणिक शोर’ का तर्क

अपने बयान में गोपाल शर्मा  ने यह भी कहा कि हिंदू धार्मिक परंपराओं में जो शोर-शराबा होता है, वह कभी-कभार और बहुत कम समय के लिए होता है। उनका कहना था कि इसे मुस्लिम समुदाय की प्रथाओं से तुलना नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि रमज़ान के दौरान पांचों वक्त की नमाज और सेहरी-अज़ान के समय लाउडस्पीकर का उपयोग नियमित रूप से किया जाता है।

शर्मा के मुताबिक, धार्मिक आयोजनों को मर्यादा के भीतर आयोजित किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ध्वनि प्रदूषण के कारण दूसरे समुदायों के लोग प्रभावित न हों। उन्होंने कहा कि समाज में आपसी सहमति और संवेदनशीलता से ही शांति कायम रह सकती है और इसके लिए सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

पहले बालमुकुंद आचार्य भी उठा चुके हैं मुद्दा

इस विवाद की पृष्ठभूमि में यह भी महत्वपूर्ण है कि कुछ दिन पहले हवामहल सीट से भाजपा विधायक बालमुकुंद आचार्य ने रमज़ान के पूरे महीने में होने वाले लाउडस्पीकर उपयोग को लेकर आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे आमजन के लिए परेशानी बताते हुए लाउडस्पीकर के उपयोग पर नियंत्रण की मांग की थी।

आचार्य ने कहा था कि रमज़ान के दौरान देर रात और सुबह-सुबह होने वाली आवाज़ें लोगों की नींद और दिनचर्या को प्रभावित करती हैं। इस बयान के बाद से ही इस मुद्दे पर राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ था, जिसे अब गोपाल शर्मा के बयान ने और भड़का दिया है।

कांग्रेस ने भाजपा पर लगाया समुदाय विशेष को निशाना बनाने का आरोप

इधर, भाजपा विधायकों के बयानों के बाद राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक और विधायक रफीक खान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह पूरी तरह से संवैधानिक अधिकारों पर हमला है।

रफीक खान का कहना है कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा-पद्धति अपनाने की अनुमति देता है। उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकर बजाना कई धार्मिक प्रथाओं का पारंपरिक हिस्सा है और इसे अचानक गलत ठहराकर किसी एक समुदाय को निशाना बनाना राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश प्रतीत होती है।

कांग्रेस नेता ने भाजपा विधायकों के बयानों को “मनुवादी सोच” का परिणाम बताया और आरोप लगाया कि इस प्रकार के बयान समाज में विभाजन पैदा करते हैं। उनके अनुसार भाजपा बार-बार ऐसे मुद्दे उठाकर एक समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह फैलाने की कोशिश करती है, जो सामाजिक सौहार्द के लिए हानिकारक है।

राजनीतिक बहस के बीच प्रशासन की भूमिका

विवाद के बढ़ते स्वरूप को देखते हुए स्थानीय प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है। कानून व्यवस्था पर प्रभाव न पड़े, इसके लिए पुलिस और जिला प्रशासन द्वारा संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। प्रशासन का कहना है कि ध्वनि प्रदूषण से जुड़े नियम पहले से लागू हैं और यदि कहीं शिकायत मिलती है, तो उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

सामाजिक सौहार्द की अपील

लाउडस्पीकर को लेकर चल रही यह बहस केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। सभी समुदायों को यह समझने की आवश्यकता है कि शहर के साझा वातावरण में एक-दूसरे की सुविधा और संवेदनशीलता का सम्मान करते हुए धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न हों।

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