राजस्थान के भीलवाड़ा में हरि सेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर के तत्वावधान में आयोजित आठ दिवसीय सनातन मंगल महोत्सव एवं दीक्षा दान समारोह के दूसरे दिन का वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ था। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने शिरकत की। परंपराओं, आस्था और सनातन संस्कृति की रक्षा पर दिए उनके सशक्त वक्तव्य ने कार्यक्रम में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं में नई चेतना का संचार किया।
राज्यपाल ने अपने संबोधन में उल्लेख किया कि विश्व की कोई भी शक्ति सनातन संस्कृति को मिटा नहीं सकती। उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है, जो हजारों वर्षों से आक्रमणों और षडयंत्रों के बावजूद अडिग और अक्षुण्ण बनी हुई है।
राज्यपाल का उद्बोधन: सनातन संस्कृति क्यों अजर-अमर?
राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने कहा कि सनातन संस्कृति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसे कोई शक्ति कमजोर नहीं कर सकती। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिन परंपराओं ने करोड़ों लोगों के जीवन को दिशा दी, जिन वेदों-उपनिषदों ने पूरी दुनिया को ज्ञान दिया, उन्हें समाप्त करना संभव ही नहीं है। उन्होंने रामायण और महाभारत का उल्लेख करते हुए कहा कि ये ग्रंथ सनातन संस्कृति के शाश्वत प्रतीक हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारशिला हैं।
राज्यपाल ने कहा कि इतिहास में कई बार गुरुकुलों को नष्ट करने, विश्वविद्यालयों को जलाने और सांस्कृतिक मूल्यों को कमजोर करने के प्रयास हुए, लेकिन सनातन संस्कृति की चेतना को कोई पराजित नहीं कर पाया। यही कारण है कि यह संस्कृति युगों-युगों तक जीवित और प्रभावशाली बनी हुई है।
आश्रम में हुआ पारंपरिक स्वागत
हरि सेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर पहुंचने पर महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम उदासीन सहित संत-महात्माओं व सनातन सेवा समिति ने राज्यपाल का स्वागत किया। राज्यपाल ने इसे “अत्यंत पवित्र और ऊर्जा से भरा अवसर” बताया और कहा कि ऐसे आयोजनों से संस्कृति और श्रद्धा दोनों सुदृढ़ होती हैं। राज्यपाल ने श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण किया तथा आश्रम में चल रहे धार्मिक अनुष्ठानों का अवलोकन किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का आयोजन समाज में सद्भाव, एकता और आध्यात्मिकता को बढ़ाने वाला है।
प्राचीन ग्रंथ, वेद और गुरुकुल पर राज्यपाल का संदर्भ
राज्यपाल बागड़े ने कहा कि सनातन संस्कृति हमेशा से ज्ञान और समावेशिता पर आधारित रही है। उन्होंने बताया कि विदेशी आक्रमणों के दौरान गुरुकुलों और प्राचीन विश्वविद्यालयों को नष्ट करने के प्रयास हुए, लेकिन भारतीय समाज की मूल चेतना और आध्यात्मिक शक्ति इतनी मजबूत थी कि संस्कृति को कोई क्षति नहीं पहुंचा सका। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन संस्कृति केवल पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला है, जिसमें करुणा, सहिष्णुता, वैश्विक कल्याण और सभी जीवों के प्रति सम्मान जैसी मूल्य निहित हैं।
कथा व्यास और संत महात्माओं का सम्मान
कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने श्रीधाम वृंदावन के कथा व्यास डॉ. श्यामसुन्दर पाराशर का अभिनंदन किया और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्हें आयोजन के उद्देश्य और कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी दी गई।
महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम उदासीन ने राज्यपाल को सनातन सिंधु चिन्ह भेंट किया और बताया कि यह महोत्सव “एक संगत–एक पंगत” की परंपरा को मजबूत बनाता है। कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद बालयोगी उमेशनाथ महाराज और भीलवाड़ा सांसद दामोदर अग्रवाल सहित बड़ी संख्या में साधु-संत, भक्त और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
वैदिक अनुष्ठानों और रासलीला की दिव्यता
राज्यपाल ने पंचकुंडीय श्री विष्णु महायज्ञ, अखंड श्रीमद् भगवद्गीता पाठ, रामचरितमानस पाठ और शतचंडी यज्ञ जैसे बहु-दिवसीय अनुष्ठानों का अवलोकन किया। काशी के यज्ञाचार्य कामेश्वरनाथ तिवारी के सानिध्य में चारों वेदों के मूल पाठ का पारायण किया जा रहा है।
आयोजकों के अनुसार प्रतिदिन शाम सात बजे श्री निकुंज बिहारी रासलीला मंडल द्वारा रासलीला प्रस्तुत की जा रही है और काशी की तर्ज पर गंगा आरती भी हो रही है। 25 फरवरी को महोत्सव की पूर्णाहुति होगी, जबकि 26 फरवरी को दीक्षा दान समारोह और संत समागम का मुख्य आयोजन निर्धारित है।
राज्यपाल की शुभकामनाएं और समापन
कार्यक्रम के अंत में राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने कहा कि यह आयोजन सनातन संस्कृति के विभिन्न स्वरूपों को समाज के सामने सशक्त रूप में प्रस्तुत करता है। उन्होंने महोत्सव की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं और कहा कि इस प्रकार के आध्यात्मिक आयोजन समाज को सकारात्मक दिशा देते हैं। भीलवाड़ा के इस महोत्सव ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि सनातन संस्कृति न केवल भारत की नींव है, बल्कि विश्व को मार्ग दिखाने वाली शाश्वत धरोहर भी है।


