राजस्थान विधानसभा में कार्यवाही के सुचारू संचालन और संसदीय मर्यादा के पालन को लेकर अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने बुधवार को महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए। अध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विधानसभा केवल औपचारिक बहस का मंच नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहां जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सीमित कार्य दिवसों के बावजूद यदि सदन में अनुशासन, उपस्थिति और मर्यादा का पालन नहीं होगा, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सदन की कार्यवाही से जुड़े कई अहम बिंदुओं पर सदस्यों और मंत्रियों को निर्देशित किया।
अध्यक्ष देवनानी ने कहा चर्चा में नामित सदस्यों की अनिवार्य उपस्थिति
अध्यक्ष देवनानी ने कहा कि जिन माननीय सदस्यों के नाम किसी विषय पर चर्चा में भाग लेने के लिए निर्धारित किए जाते हैं, उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे संबंधित मंत्री के उत्तर तक सदन में उपस्थित रहें। उन्होंने स्पष्ट किया कि चर्चा केवल अपने विचार रखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि मंत्री द्वारा दिए गए उत्तर को सुनना भी उतना ही आवश्यक है। अध्यक्ष ने कहा कि यह देखा गया है कि कई बार सदस्य अपनी बात रखने के बाद सदन से बाहर चले जाते हैं, जिससे चर्चा की गंभीरता और उद्देश्य प्रभावित होता है। जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे पूरे समय सदन में उपस्थित रहकर चर्चा की प्रक्रिया को पूरा समझें।
कोरम की समस्या पर चिंता
राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष ने कोरम की स्थिति पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अक्सर सदन में कोरम पूरा नहीं होने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे कार्यवाही बाधित होती है और समय की बर्बादी होती है। उन्होंने सभी सदस्यों से अपील की कि वे सदन में नियमित रूप से उपस्थित रहें, विशेषकर वे सदस्य जिनका नाम चर्चा के लिए सूचीबद्ध है। अध्यक्ष ने कहा कि कोरम केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह सदन की सामूहिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
अनुदान मांगों पर मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी
अध्यक्ष देवनानी ने अनुदान की मांगों पर चर्चा के दौरान मंत्रिमंडल की उपस्थिति को भी अनिवार्य बताया। उन्होंने निर्देश दिए कि जब किसी भी अनुदान मांग पर संबंधित मंत्री उत्तर दे रहे हों, उस समय मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की भी सदन में उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।
उन्होंने कहा कि कुल 16 अनुदान मांगों पर अलग-अलग मंत्रियों को उत्तर देना होता है। ऐसे में केवल संबंधित मंत्री की ही नहीं, बल्कि पूरे मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि वे सदन में उपस्थित रहकर चर्चा को सुनें। यह संसदीय परंपरा और सदन की मर्यादा के अनुरूप है।
कटौती प्रस्तावों की प्रक्रिया स्पष्ट
अध्यक्ष ने अनुदान मांगों पर कटौती प्रस्तावों की प्रक्रिया को भी विस्तार से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जिस दिन संबंधित अनुदान मांग सदन में ली जाती है, उस दिन प्रस्तुत सभी कटौती प्रस्ताव सदन में प्रस्तुत माने जाएंगे। बोलने की अनुमति उन्हीं सदस्यों को दी जाएगी, जिनके नाम विभिन्न दलों के सचेतकों और सरकारी मुख्य सचेतक द्वारा आसन को भेजे जाएंगे।
उन्होंने बताया कि प्राथमिकता उन सदस्यों को दी जाएगी, जिनके कटौती प्रस्ताव सूचीबद्ध हैं। मतदान के समय यह संसदीय परंपरा रही है कि प्रस्तुत कटौती प्रस्ताव स्वतः वापस माने जाते हैं। जिस सदस्य का नाम पुकारा जाएगा, वे अपने सभी कटौती प्रस्तावों पर एक साथ उसी समय अपने विचार रख सकेंगे। इसके अतिरिक्त पार्टी के नेता या अन्य प्रमुख सदस्य भी अपनी पार्टी की ओर से विचार व्यक्त कर सकते हैं।
प्रश्नों के उत्तर और मतदान की प्रक्रिया
अध्यक्ष देवनानी ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुदान मांगों पर बहस के दौरान उठाए गए प्रश्नों का उत्तर संबंधित मंत्री उसी दिन देंगे। इसके बाद ही मांगों पर मतदान की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। उन्होंने कहा कि समयाभाव के कारण यदि किसी प्रश्न का उत्तर तत्काल नहीं दिया जा सका, तो उसका लिखित उत्तर संबंधित माननीय सदस्य को उपलब्ध कराया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सदन में उठाए गए सवालों का समाधान समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से हो सके।
विधायकों से अनुशासन और मर्यादा का आह्वान
अंत में राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष ने सभी माननीय सदस्यों से संसदीय परंपराओं के पालन और सदन की गरिमा बनाए रखने में सक्रिय सहयोग देने की अपेक्षा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि विधायकगण को जनता चुनकर विधानसभा भेजती है और यह उनका नैतिक दायित्व है कि वे सत्र के दौरान पूरे समय सदन में उपस्थित रहें। अध्यक्ष देवनानी ने कहा कि अनुशासन, मर्यादा और जिम्मेदारी के बिना संसदीय लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। उन्होंने सभी सदस्यों से आग्रह किया कि वे सदन को केवल राजनीतिक मंच न मानकर, जनहित के निर्णयों का केंद्र समझें।


