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RTE प्रवेश पर मंत्री और निदेशालय के निर्देशों में अंतर से बढ़ा विवाद

RTE प्रवेश पर मंत्री और निदेशालय के निर्देशों में अंतर से बढ़ा विवाद

जोधपुर सहित पूरे राजस्थान में RTE प्रवेश प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर असमंजस और नाराजगी का माहौल बन गया है। मामले की शुरुआत तब हुई जब 11 जनवरी को आयोजित एक कार्यक्रम में राज्य के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने आरटीई प्रवेश प्रणाली में बदलाव का संकेत देते हुए कहा था कि आगामी सत्र से प्रवेश के लिए वार्ड की बाध्यता समाप्त कर पूरी जिले को आधार बनाया जाएगा। मंत्री का तर्क था कि इससे अभिभावकों को अधिक विकल्प मिल सकेंगे और वे अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार किसी भी विद्यालय का चयन कर पाएंगे। शिक्षा मंत्री के इस बयान के बाद अभिभावकों और निजी स्कूल संचालकों में उम्मीद जगी कि प्रवेश प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनेगी।

लेकिन स्थिति तब उलझ गई जब प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय की ओर से सत्र 2026-27 के लिए जारी किए गए दिशा-निर्देशों में पिछले वर्ष की तरह वार्ड-आधारित प्राथमिकता प्रणाली को ही लागू रखने की पुष्टि कर दी गई। निदेशालय के टाइम-फ्रेम और नए आदेशों में यह स्पष्ट किया गया कि आरटीई के तहत प्राथमिकता क्रम पहले वार्ड के बच्चों, उसके बाद शहर के अन्य क्षेत्रों के बच्चों और अंत में शेष पात्रता वाले विद्यार्थियों को दी जाएगी। इस अंतर ने निजी विद्यालय संचालकों को और अधिक नाराज कर दिया।

निजी स्कूल संचालक संघ के जिलाध्यक्ष जमना शंकर प्रजापति और अन्य पदाधिकारियों का कहना है कि वार्ड आधारित व्यवस्था के चलते हर साल हजारों अभिभावकों को अपनी पसंद के विद्यालय में प्रवेश नहीं मिल पाता और भ्रम की स्थिति बनी रहती है। संघ का आरोप है कि सरकार ने मंत्री स्तर पर वार्ड की बाध्यता हटाने की घोषणा की थी, लेकिन विभागीय स्तर पर जारी आदेशों में कोई बदलाव नहीं किया गया। संघ ने यह मांग भी रखी कि सरकार सार्वजनिक रूप से किए गए वादों का पालन करे और प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी, सरल और तकनीकी रूप से मजबूत बनाए।

संघ ने चेतावनी दी कि यदि घोषित सुधार जमीन पर लागू नहीं किए गए, तो वे आगे भी अपनी आवाज उठाते रहेंगे। विद्यालय संचालकों ने यह भी याद दिलाया कि इससे पहले निजी स्कूलों में पढ़ने वाले पांचवीं कक्षा के बच्चों से 50 रुपये प्रति छात्र के सुविधा शुल्क को न लेने के संबंध में शिक्षा मंत्री ने घोषणा की थी, लेकिन विभागीय आदेशों में यह शुल्क स्कूलों से वसूलने की बात फिर से शामिल कर दी गई। इस विरोधाभास ने निजी स्कूल संचालकों को और अधिक असंतुष्ट कर दिया है।

इधर शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि आरटीई के तहत पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों से शुल्क नहीं लिया जाएगा और यह सुविधा शुल्क विद्यालयों की ओर से जमा कराया जाएगा। विभाग का यह भी कहना है कि मंत्री के जोधपुर में दिए गए बयान का तात्पर्य यह नहीं था कि प्रवेश का आधार पूरा जिला बना दिया जाएगा, बल्कि बात का संदर्भ अलग तरीके से समझ लिया गया। विभाग का यह बयान विवाद को शांत करने का प्रयास माना जा रहा है, लेकिन निजी स्कूल संचालक इसे पर्याप्त नहीं मान रहे।

इस बीच राज्य में आरटीई प्रवेश प्रक्रिया को लेकर एक बड़ा बदलाव भी किया गया है। पहले जहां केवल नर्सरी और पहली कक्षा में ही आरटीई के तहत प्रवेश मिलता था, वहीं इस बार विभाग ने नर्सरी के साथ-साथ एलकेजी, यूकेजी और पहली कक्षा तक कुल चार श्रेणियों में एडमिशन की अनुमति दे दी है। इसके लिए आवेदन प्रक्रिया 20 फरवरी से शुरू की जाएगी और 6 मार्च को लॉटरी निकाली जाएगी। प्रवेश प्रभारी चंद्र किरण पंवार ने बताया कि नर्सरी में तीन से चार वर्ष के बच्चों, एलकेजी में चार से पांच वर्ष, यूकेजी में पांच से छह वर्ष और पहली कक्षा में छह से सात वर्ष के बच्चों को पात्र माना जाएगा।

आरटीई सीट के निर्धारण के लिए एक नया फार्मूला भी लागू किया गया है। इसके तहत निजी स्कूलों में पिछले तीन वर्षों के नर्सरी से पहली कक्षा तक के प्रवेश आंकड़ों का औसत निकाला जाएगा। इसी औसत संख्या का 25 प्रतिशत आरटीई सीटों के रूप में निर्धारित किया जाएगा। यदि किसी स्कूल में एलकेजी की कुल 10 सीटें होती हैं, लेकिन नर्सरी से प्रमोशन पाकर केवल 8 विद्यार्थी पहुंचे हैं, तो शेष दो सीटों पर आरटीई के तहत प्रवेश दिया जाएगा। इसी प्रकार यूकेजी और पहली कक्षा में भी खाली सीटों को भरने का यही सिद्धांत लागू होगा। इस परिवर्तन से उन सभी खाली सीटों का उपयोग हो सकेगा, जो अब तक प्रमोशन के दौरान रह जाती थीं और जिन पर पहले आरटीई के तहत प्रवेश संभव नहीं था।

निजी स्कूल संचालकों का मानना है कि इस नए नियम से प्रदेश में आरटीई के तहत प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या में निश्चित रूप से वृद्धि होगी, लेकिन यह तभी प्रभावी हो पाएगा जब वार्ड आधारित प्राथमिकता को हटाकर जिले-आधारित या समान अवसर वाली प्रणाली लागू की जाएगी। अभिभावकों की मांग भी इसी ओर है कि बच्चों को अपनी पसंद के विद्यालय में आवेदन करने की स्वतंत्रता मिले और डिजिटल आवंटन प्रक्रिया किसी भी तरह के क्षेत्रीय प्रतिबंधों से मुक्त हो।

राज्य में आरटीई प्रवेश को लेकर जारी यह विवाद अभी खत्म होने के आसार नहीं दिखते। शिक्षा मंत्री के बयान और निदेशालय के दिशा-निर्देशों में अंतर ने न केवल निजी विद्यालय संचालकों को परेशान किया है, बल्कि अभिभावकों को भी दुविधा में डाल दिया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार प्रवेश प्रक्रिया में वास्तविक सुधार लागू करेगी या यह विवाद आगे और बढ़ेगा।

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