राजस्थान में साध्वी प्रेम बाईसा की मौत को लेकर उठ रहे सवालों और चर्चाओं के बीच आखिरकार पुलिस कमिश्नरेट जयपुर ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तृत जानकारी दी। पिछले 18 दिनों से यह मामला लगातार चर्चा में था और सोशल मीडिया पर अलग-अलग तरह की आशंकाएं जताई जा रही थीं। ऐसे में पुलिस की ओर से प्रस्तुत तथ्यात्मक रिपोर्ट ने घटना की दिशा को स्पष्ट किया है।
पुलिस के अनुसार प्रेम बाईसा की मौत किसी रहस्यमयी कारण से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या के चलते हुई। इस दौरान उनके उपचार में हुई लापरवाही ने हालत को और बिगाड़ दिया, जो अंततः मृत्यु का कारण बना। जांच दल ने कई दिनों तक आश्रम, परिवार और संबंधित लोगों से पूछताछ कर तथ्य इकट्ठे किए थे, जिनके आधार पर यह रिपोर्ट सामने आई है।
आश्रम में अचानक बिगड़ी तबीयत, पिता ने बुलाया कंपाउंडर
घटना वाले दिन साध्वी प्रेम बाईसा आश्रम में थीं, जब उनकी तबीयत अचानक खराब हुई। उन्हें सांस लेने में काफी दिक्कत हो रही थी। उनके पिता वीरमनाथ ने स्थिति को देखते हुए कंपाउंडर देवी सिंह को बुलाया, जो आश्रम के आसपास चिकित्सा सहायता उपलब्ध होने पर आता-जाता रहता था।
कंपाउंडर के पहुंचने के बाद उसने प्रेम बाईसा को दो इंजेक्शन लगाए, लेकिन इंजेक्शन लगने के बाद उनकी हालत संभलने के बजाय और ज्यादा बिगड़ गई। तत्काल उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह वही क्षण था, जिसने इस पूरी घटना को संदेह और चर्चाओं के घेरे में खड़ा कर दिया।
एसआईटी ने 46 लोगों से पूछताछ की, दर्जनों सीसीटीवी फुटेज देखे
पुलिस कमिश्नर ने जानकारी दी कि घटना की गहराई से जांच के लिए विशेष जांच टीम (SIT) गठित की गई थी। टीम ने आश्रम से जुड़े 46 लोगों से पूछताछ की, जिनमें परिवार के सदस्य, अनुयायी, आश्रम से जुड़े सहायक, पड़ोसी और चिकित्सा सहायता देने वाले लोग शामिल थे।
इसके साथ ही आश्रम और आसपास के इलाकों के कई CCTV फुटेज भी खंगाले गए। इन फुटेज में घटना के पहले और बाद की गतिविधियों को ध्यान से जांचा गया, ताकि किसी प्रकार की साजिश, दुर्व्यवहार या बाहरी हस्तक्षेप की संभावना को परखा जा सके। जांच में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जो जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की ओर इशारा करता हो।
विसरा रिपोर्ट और पोस्टमार्टम ने स्पष्ट की मौत की वजह
मेडिकल बोर्ड द्वारा की गई पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विसरा जांच ने यह स्पष्ट कर दिया कि साध्वी प्रेम बाईसा की मौत कार्डियक अरेस्ट के चलते हुई। साथ ही यह भी पाया गया कि वह पहले से अस्थमा और सांस संबंधी बीमारी से पीड़ित थीं।
डॉक्टर्स के अनुसार गंभीर सांस की तकलीफ के दौरान गलत दवा या गलत मात्रा में दवा दिए जाने से शरीर पर अत्यधिक दबाव पड़ सकता है, जो कार्डियक अरेस्ट का कारण बन सकता है। हालांकि यह निष्कर्ष अभी पूरी तरह अंतिम नहीं माना गया है, क्योंकि पुलिस कंपाउंडर द्वारा दिए गए इंजेक्शनों की प्रकृति और प्रभाव की भी जांच कर रही है।
कंपाउंडर पर लापरवाही का आरोप, क्या वह इंजेक्शन लगाने का अधिकार रखता था?
पुलिस कमिश्नर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि कंपाउंडर देवी सिंह पर चिकित्सा प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही का आरोप बनता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि देवी सिंह ने बिना किसी डॉक्टर की पर्ची के साध्वी को इंजेक्शन लगाया।
कानून के अनुसार किसी भी कंपाउंडर को केवल डॉक्टर की देखरेख या निर्देश पर ही दवा या इंजेक्शन लगाने की अनुमति होती है। इस मामले में यह नियम पूरी तरह टूटा है। अब यह जांच भी की जा रही है कि देवी सिंह के पास चिकित्सा से संबंधित कोई मान्य प्रमाणपत्र या लाइसेंस था या नहीं। यदि वह बिना अनुमति के चिकित्सा कार्य कर रहा था, तो उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता के साथ ही मेडिकल एक्ट के provisions के तहत कार्रवाई की जाएगी।
साध्वी के आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट पर क्या बोली पुलिस
साध्वी प्रेम बाईसा की मौत के बाद सोशल मीडिया पर उनका आखिरी इंस्टाग्राम पोस्ट काफी चर्चाओं में रहा। पोस्ट में उन्होंने कई आध्यात्मिक गुरुओं का आशीर्वाद मिलने की बात कही थी और कुछ पंक्तियों ने लोगों में भ्रम और आशंका पैदा कर दी थी।
पुलिस कमिश्नर ओम प्रकाश ने बताया कि यह पोस्ट साध्वी की मृत्यु के बाद उनके पिता वीरमनाथ के कहने पर डाला गया था। इसमें किसी प्रकार की दुर्भावना, साजिश या भ्रामक उद्देश्य नहीं था। यह केवल श्रद्धा और भावनाओं के आधार पर लिखा गया संदेश था। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों और नकारात्मक अटकलों पर काफी हद तक विराम लग गया है।
जांच अभी जारी, कानून के अनुसार होगी कार्रवाई
हालांकि पुलिस ने प्राथमिक जांच रिपोर्ट में मौत की मेडिकल वजह साफ कर दी है, लेकिन तकनीकी जांच, इंजेक्शन की संरचना और कंपाउंडर की प्रमाणिकता की जांच अभी जारी है। पुलिस का कहना है कि लापरवाही साबित होने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तय है। यह मामला धार्मिक आश्रमों, निजी चिकित्सा हस्तक्षेप और स्वास्थ्य लापरवाही के बड़े सवालों को भी सामने लाता है, जिन पर आगे विस्तृत चर्चा और नियमन की जरूरत महसूस की जा रही है।


