आज की तेज रफ्तार जिंदगी में मानसिक तनाव, चिंता और बेचैनी आम समस्या बन चुकी है। ऐसे में योग और प्राणायाम के पारंपरिक अभ्यास फिर से प्रासंगिक हो रहे हैं। भ्रामरी प्राणायाम एक ऐसा ही प्रभावी अभ्यास है, जो मधुमक्खी जैसी गुनगुनाहट के माध्यम से मन और नर्वस सिस्टम को शांत करने में मदद करता है। सामान्यतः लोग इसे केवल सांस लेकर गुनगुनाने और छोड़ने की प्रक्रिया मानते हैं, लेकिन वास्तव में यह अभ्यास शरीर, मन और ऊर्जा के संतुलन से जुड़ा एक व्यापक तंत्र है।
भ्रामरी में सही शारीरिक मुद्रा, सांस की गहराई, हाथों की स्थिति और मानसिक एकाग्रता का विशेष महत्व है। जब इन सभी तत्वों का संतुलित समन्वय होता है, तब यह अभ्यास गहराई से असर करता है।
एक्सपर्ट की राय: सिर्फ रिलैक्सेशन नहीं, ऊर्जा का परिवर्तन
योग और ध्यान के अनुभवी प्रशिक्षक हिमालयन सिद्धा अक्षर के अनुसार, भ्रामरी प्राणायाम केवल रिलैक्सेशन तकनीक नहीं है, बल्कि यह हमारे मूड और आंतरिक ऊर्जा को भी परिवर्तित कर सकती है। उनका कहना है कि जब उन्होंने पहली बार भ्रामरी का अभ्यास किया, तो यह बिखरे हुए विचारों को शांत कर उन्हें वर्तमान क्षण में ले आई।
उनके अनुभव के अनुसार, यह अभ्यास भीतर की बेचैनी को कम करता है और मन को स्थिरता प्रदान करता है। नियमित अभ्यास से व्यक्ति अपने विचारों पर अधिक नियंत्रण महसूस करता है और मानसिक स्पष्टता बढ़ती है।
ध्वनि और नर्वस सिस्टम का संबंध
भ्रामरी प्राणायाम की मूल अवधारणा ध्वनि पर आधारित है। प्राचीन परंपराओं में ध्वनि को सृजन का मूल तत्व माना गया है। सिद्ध परंपरा के अनुसार ब्रह्मांड विभिन्न आवृत्तियों और कंपन से निर्मित है, जहां ऊर्जा, पदार्थ और चेतना एक लयबद्ध संरचना में कार्य करते हैं।
भ्रामरी में जब व्यक्ति अपनी सांस से उत्पन्न ध्वनि को भीतर गूंजने देता है, तो यह कंपन शरीर के विभिन्न हिस्सों में फैलती है। यह कंपन विशेष रूप से खोपड़ी और साइनस क्षेत्र में अनुभव होती है और धीरे-धीरे नर्वस सिस्टम के साथ इंटरैक्ट करती है।
आधुनिक शोध भी संकेत देते हैं कि लयबद्ध ध्वनि और कंपन दिमाग के न्यूरल पाथवे को सिंक्रोनाइज़ करने में मदद कर सकती है। यह वेगल टोन को बेहतर बनाती है, जिससे पैरासिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय होता है। यह वही प्रणाली है जिसे शरीर का ‘रेस्ट एंड डाइजेस्ट’ मोड कहा जाता है। इसके सक्रिय होने से हृदय गति स्थिर होती है, रक्तचाप नियंत्रित रहता है और स्ट्रेस हार्मोन का स्तर कम होता है।
मानसिक और शारीरिक लाभ
भ्रामरी प्राणायाम के लाभ केवल मानसिक शांति तक सीमित नहीं हैं। कंपन की यह प्रक्रिया शरीर के टिश्यूज़ और तरल प्रवाह को भी प्रभावित करती है। जब ध्वनि की गूंज साइनस और सिर के आसपास फैलती है, तो यह क्षेत्र में रक्त प्रवाह को संतुलित करती है और हल्के सिरदर्द या तनावजन्य जकड़न में राहत दे सकती है।
नियमित अभ्यास से चिंता में कमी, भावनात्मक संतुलन और एकाग्रता में सुधार देखा गया है। कई लोग इसे सोने से पहले करते हैं, जिससे नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है। यह अभ्यास उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी हो सकता है, जो अत्यधिक मानसिक दबाव या कार्यस्थल के तनाव से जूझ रहे हैं।
भ्रामरी प्राणायाम का सही तरीका
भ्रामरी का प्रभाव तभी अधिक होता है, जब इसे सही तरीके से किया जाए। इसके लिए किसी शांत और हवादार स्थान का चयन करें। आरामदायक मुद्रा में बैठें, रीढ़ सीधी रखें और आंखें बंद कर लें। कुछ क्षण सामान्य सांस लेते हुए मन को शांत करें।
इसके बाद नाक से गहरी सांस लें। सांस छोड़ते समय होंठ बंद रखें और मधुमक्खी जैसी धीमी और स्थिर गुनगुनाहट करें। कोशिश करें कि यह ध्वनि लंबी और सहज हो। कंपन को सिर, चेहरे और गले के आसपास महसूस करें। इस प्रक्रिया को छह से दस बार दोहराएं। अंत में कुछ क्षण शांत बैठकर अपने भीतर की शांति को अनुभव करें।
नियमित अभ्यास से इसका प्रभाव और गहरा होता है।
अंदरूनी शोर को शांत करने का माध्यम
भ्रामरी प्राणायाम केवल बाहरी शोर को अनदेखा करने का साधन नहीं है, बल्कि यह भीतर के मानसिक शोर को भी शांत करता है। जब मन की बेचैनी कम होती है, तो निर्णय क्षमता बेहतर होती है और व्यक्ति अधिक संतुलित महसूस करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रामरी एक सरल लेकिन प्रभावशाली अभ्यास है, जिसे दिन में कुछ ही मिनट देकर अपनाया जा सकता है। यह न केवल तनाव से तत्काल राहत देता है, बल्कि दीर्घकालिक मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी सहायक है।
आज के समय में जब मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी चिंता बन चुका है, भ्रामरी प्राणायाम जैसे पारंपरिक अभ्यास आधुनिक जीवनशैली में संतुलन लाने का सशक्त माध्यम बन सकते हैं। नियमित और सही तरीके से किया गया यह अभ्यास मन के शोर को शांत कर भीतर स्थिरता और संतुलन की भावना विकसित करता है।


