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सीनियर रेजिडेंट कोर्स पर हाईकोर्ट सख्त, 46 मेडिकल ऑफिसर्स को तत्काल रिलीव करने का आदेश

सीनियर रेजिडेंट कोर्स पर हाईकोर्ट सख्त, 46 मेडिकल ऑफिसर्स को तत्काल रिलीव करने का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग को बड़ा झटका देते हुए 46 मेडिकल ऑफिसर्स को सीनियर रेजिडेंट कोर्स जॉइन करने के लिए तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त करने का आदेश दिया है। जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी की एकलपीठ ने इन डॉक्टरों की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि सभी याचिकाकर्ताओं को 13 फरवरी तक हर हाल में रिलीव किया जाए, ताकि वे 14 फरवरी की अंतिम तिथि तक अपना कोर्स जॉइन कर सकें।

कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के प्रमुख शासन सचिव सहित अन्य उच्चाधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया है। यह आदेश अंतरिम रूप से जारी किया गया है, लेकिन इससे चिकित्सा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

46 डॉक्टरों की ओर से दायर की गई थी याचिका

यह रिट याचिका डॉ. भरत कुमार पारीक, कुचामन सिटी सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों में कार्यरत 46 डॉक्टरों की ओर से दायर की गई थी। इन याचिकाकर्ताओं में जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, जालोर, बीकानेर, अजमेर, जैसलमेर और पाली सहित कई जिलों के चिकित्सक शामिल हैं।

डॉक्टरों की ओर से अधिवक्ता यशपाल खिलेरी ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि सभी याचिकाकर्ता एमबीबीएस के बाद इन-सर्विस कैंडिडेट के रूप में पीजी कोर्स पूरा कर चुके हैं। अब उन्होंने मेरिट के आधार पर सीनियर रेजिडेंट कोर्स के लिए चयन प्राप्त किया है, लेकिन चिकित्सा विभाग उन्हें कार्यमुक्त नहीं कर रहा है।

पीजी के बाद सीनियर रेजिडेंसी अनिवार्य

याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि नेशनल मेडिकल कमीशन के नियमों के अनुसार, चिकित्सा शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए तीन वर्षीय पीजी कोर्स के बाद एक वर्ष का सीनियर रेजिडेंट कोर्स करना अनिवार्य है। यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विशेषज्ञता और शैक्षणिक योग्यता का महत्वपूर्ण चरण है।

अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि राज्य सरकार के 5 जुलाई 2022 के परिपत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि किसी डॉक्टर का चयन उच्च शिक्षा जैसे पीजी, डीएनबी या सीनियर रेजिडेंसी के लिए होता है, तो संबंधित नियंत्रण अधिकारी उसे अनिवार्य रूप से रिलीव करेगा। इसके बावजूद विभाग द्वारा रिलीव न करना परिपत्र के विपरीत है।

सरकार का तर्क: स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होंगी

दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में तर्क दिया गया कि इन डॉक्टरों की पोस्टिंग जनहित और प्रशासनिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए की गई है। सरकार ने बताया कि लगभग 450 डॉक्टरों का चयन सीनियर रेजिडेंसी के लिए और करीब 800 डॉक्टरों का चयन पीजी कोर्स के लिए हुआ है। यदि सभी को एक साथ कार्यमुक्त कर दिया गया तो प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को पर्याप्त आधारहीन माना। न्यायालय ने कहा कि सरकार ने डॉक्टरों की कथित कमी या संभावित संकट को दर्शाने के लिए रिकॉर्ड पर कोई ठोस आंकड़े या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए। केवल प्रशासनिक असुविधा का हवाला देकर किसी डॉक्टर के करियर को बाधित करना उचित नहीं है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के मामले ‘डॉ. रोहित कुमार बनाम दिल्ली सरकार’ का उल्लेख करते हुए कहा कि उच्च योग्यता प्राप्त करने वाले डॉक्टर न केवल चिकित्सा समुदाय के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संपत्ति हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब डॉक्टर अतिरिक्त विशेषज्ञता और प्रशिक्षण लेकर वापस सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में लौटते हैं तो इससे संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होती है। इसलिए प्रशासनिक असुविधा या अस्थायी कमी के आधार पर उनके संवैधानिक अधिकारों और करियर उन्नति के अवसरों को नहीं रोका जा सकता। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि डॉक्टरों को समय पर रिलीव नहीं किया गया तो उन्हें अपूरणीय क्षति होगी, क्योंकि कोर्स जॉइन करने की अंतिम तिथि निकल जाने पर उनका एक वर्ष व्यर्थ हो सकता है।

अंतरिम आदेश और आगे की सुनवाई

कोर्ट ने इस मामले में अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया कि सभी याचिकाकर्ताओं को तत्काल प्रभाव से रिलीव किया जाए। साथ ही, इस याचिका को पहले से लंबित अन्य संबंधित याचिका के साथ सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जिसमें सरकार को अपना विस्तृत जवाब प्रस्तुत करना होगा।

यह आदेश न केवल संबंधित 46 डॉक्टरों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल भी स्थापित करता है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि उच्च शिक्षा और पेशेवर उन्नति के अधिकार को केवल प्रशासनिक कारणों से बाधित नहीं किया जा सकता।

राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था और चिकित्सा शिक्षा के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता भी इस मामले से उजागर हुई है। अब यह देखना होगा कि सरकार आगामी सुनवाई में क्या रुख अपनाती है और क्या वह अपनी नीतियों में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करती है।

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