राजस्थान में इन दिनों एक नया पर्यावरण आंदोलन चर्चा में है—खेजड़ी बचाओ आंदोलन। इसकी शुरुआत बीकानेर से हुई, जहां स्थानीय लोगों ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में खेजड़ी वृक्षों की कटाई का विरोध किया। कुछ ही समय में यह आंदोलन बीकानेर की सीमा पार कर पूरे राजस्थान के पर्यावरण प्रेमियों, सामाजिक संगठनों, संत समाज और राजनीतिक दलों का प्रमुख मुद्दा बन गया। हर वर्ग एक स्वर में खेजड़ी वृक्ष के संरक्षण की मांग कर रहा है। लेकिन आखिर खेजड़ी इतनी खास क्यों है? राजस्थान में खेजड़ी को क्यों ‘जीवनरेखा’ कहा जाता है? यह रिपोर्ट खेजड़ी के महत्व, इतिहास और आंदोलन की पृष्ठभूमि को विस्तार से समझाती है।
राजस्थान का राज्य वृक्ष: एक प्रतीक और पर्यावरणीय आधार
खेजड़ी को राजस्थान सरकार ने वर्ष 1983 में राज्य वृक्ष का दर्जा दिया। यह निर्णय सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि इस पेड़ के गहरे पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व को मान्यता देने वाला था। खेजड़ी का वैज्ञानिक नाम Prosopis cineraria है। यह दक्षिण पश्चिम एशिया और अफ्रीका के शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है, लेकिन राजस्थान में इसकी भूमिका किसी साधारण पेड़ से कहीं आगे है।
रेगिस्तान की कठोर जलवायु में जीवित रहने की क्षमता
खेजड़ी ऐसा वृक्ष है जो थार रेगिस्तान की कठोर जलवायु में भी सहजता से उग जाता है।
सूखी, नमी रहित मिट्टी में भी पनपता है
तेज गर्मी और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में टिकाऊ
उसकी जड़ें भूमिगत जलस्तर को स्पर्श कर पानी सोखकर पेड़ को जीवित रखती हैं
शेखावाटी क्षेत्र और पश्चिमी राजस्थान के जिलों—बीकानेर, जोधपुर, नागौर, जैसलमेर, बाड़मेर—में इसकी संख्या सबसे अधिक पाई जाती है। यहां यह पेड़ सिर्फ हरियाली नहीं देता, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित रखने में बड़ी भूमिका निभाता है।
मिट्टी को बांधने और रेत के टीलों को स्थिर रखने में भूमिका
रेगिस्तान में सबसे बड़ी समस्या उड़ती रेत और बदलते टीले हैं। खेजड़ी की मजबूत जड़ें:
मिट्टी को बांधे रखती हैं
रेत के टीलों को स्थिर करती हैं
बंजर जमीन को खेती के योग्य बनाने में मदद करती हैं, इस वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में किसान सदियों से खेजड़ी को खेतों के बीच लगाते आए हैं।
कृषि के लिए वरदान: फसलों के लिए साथी पेड़
ग्रामीणों ने अनुभव से सीखा कि खेजड़ी का पेड़ फसलों के लिए कोई नुकसान नहीं करता, बल्कि लाभ पहुंचाता है।
इस पेड़ की छाया फसलों को गर्म हवाओं से बचाती है
मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होती है
जड़ें हवा से नाइट्रोजन खींचकर मिट्टी में छोड़ती हैं, इसलिए इसे रेगिस्तान का कल्पवृक्ष भी कहा गया है।
लूंग: पौष्टिक चारा, जिसमें 12–18% प्रोटीन
खेजड़ी की पत्तियां, जिन्हें लूंग कहा जाता है, पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक चारा हैं।
प्रोटीन की मात्रा 12 से 18% तक
डेयरी पशुओं के लिए उत्तम भोजन
सूखे के समय पूरे पशुधन को जीवित रखने में मददगार
इसी वजह से खेजड़ी पेड़ राजस्थान में पशुपालक समुदाय के लिए आर्थिक सुरक्षा का आधार है।
सांगरी: राजस्थान की प्रसिद्ध सब्जी और महंगी वन उपज
खेजड़ी का फल सांगरी कहलाता है, जो राजस्थान की पारंपरिक व्यंजनों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
सूखी सांगरी बाज़ार में 700 से 1000 रुपये प्रति किलो तक बिकती है
राजस्थानी ‘पंचकूट’ और ‘कैर-सांगरी’ जैसी डिशें इसके बिना अधूरी हैं , यह ग्रामीण परिवारों के लिए आय का बड़ा स्रोत भी बन चुका है।
खेजड़ी की लकड़ी: टिकाऊ और बहुउपयोगी
खेजड़ी की लकड़ी मजबूत और दीर्घायु मानी जाती है। इसका उपयोग:
झोपड़ियां व ग्रामीण आवास निर्माण
हल, कुदाल जैसे कृषि औजार
फर्नीचर में किया जाता है। रेगिस्तान में ऐसी लकड़ी मिलना दुर्लभ है जो दीमकरोधी भी हो। खेजड़ी में यह गुण भी पाया जाता है।
छाल के औषधीय गुण
खेजड़ी की छाल को परंपरागत चिकित्सा में गठिया, बिच्छू के डंक के इलाज में उपयोग किया जाता है। कई आयुर्वेदिक दवाओं में भी इसका प्रयोग होता है।
बिश्नोई समुदाय की आस्था का पेड़
राजस्थान का बिश्नोई समुदाय पर्यावरण संरक्षण के लिए विश्वभर में जाना जाता है। उनकी धार्मिक आस्था में खेजड़ी का पेड़ अत्यंत पवित्र माना जाता है।
वे पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा को अपने धर्म का हिस्सा मानते हैं
खेजड़ी को बचाने के लिए वे हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहते हैं
इस आस्था का सबसे बड़ा उदाहरण 1730 का खेजड़ली आंदोलन है।
खेजड़ली नरसंहार: 363 लोगों का बलिदान
12 सितंबर 1730 को जोधपुर के खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुषों और बच्चों ने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया।
वे खेजड़ी पेड़ों को काटे जाने से रोकने के लिए उन्हें पकड़कर खड़े हो गए
सैनिकों ने पेड़ों के साथ-साथ लोगों को भी काट दिया
यह घटना विश्व इतिहास का पहला बड़ा पर्यावरण आंदोलन मानी जाती है , खेजड़ी आज भी उस बलिदान का प्रतीक है।
आज का आंदोलन: आधुनिक विकास बनाम पारिस्थितिकी
हाल ही में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण और पेड़ों की कटाई ने स्थानीय जनता को चिंता में डाल दिया है।
हजारों खेजड़ी पेड़ काटे जाने की आशंका
मरुस्थलीय पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव
पशुओं के चारे और किसानों की सुरक्षा पर खतरा
इसी के विरोध में खेजड़ी बचाओ आंदोलन तेजी पकड़ रहा है। ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, संतों और नेताओं का साझा मत है कि विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर नहीं।
खेजड़ी सिर्फ पेड़ नहीं, राजस्थान की पहचान है
खेजड़ी मरुस्थल के जीवन से लेकर अर्थव्यवस्था, संस्कृति, इतिहास और धार्मिक आस्था तक हर क्षेत्र में गहराई से जुड़ी है। इसलिए इसे सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवनरेखा, रेगिस्तान का राजा, और कल्पवृक्ष कहा जाता है। राजस्थान के लिए खेजड़ी का संरक्षण सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि पहचान और परंपरा को बचाने का प्रश्न भी है।


