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राजस्थान की सियासत में फिर छाया ‘नाथी का बाड़ा’, विधानसभा से सोशल मीडिया तक छिड़ी बहस

राजस्थान की सियासत में फिर छाया ‘नाथी का बाड़ा’, विधानसभा से सोशल मीडिया तक छिड़ी बहस

राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर ‘नाथी का बाड़ा’ चर्चा के केंद्र में आ गया है। मौका था विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर बहस का, जहां मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पर पलटवार करते हुए इस शब्द का उल्लेख किया। सीएम के इस तंज के बाद न केवल सदन में सियासी हलचल तेज हो गई, बल्कि सोशल मीडिया पर भी ‘नाथी का बाड़ा’ ट्रेंड करने लगा। इसके साथ ही कांग्रेस और भाजपा नेताओं के बीच बयानबाजी का दौर शुरू हो गया।

सीएम भजनलाल शर्मा का कांग्रेस पर तंज

5 फरवरी को विधानसभा में बहस का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कांग्रेस नेताओं पर निशाना साधा। उन्होंने इशारों में गोविंद सिंह डोटासरा पर तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री के पास जब लोग अपनी समस्याएं लेकर जाते थे, तो वे उन्हें किसी बाड़े का रास्ता दिखा देते थे। इस पर भाजपा विधायकों की ओर से ‘नाथी का बाड़ा’ का नाम लिया गया।

सीएम ने आगे कहा कि जिन लोगों के पास सत्ता थी, तब वे मौन थे और अब सत्ता जाने के बाद भ्रष्टाचार, युवाओं और नैतिकता की बातें कर रहे हैं। उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा कि “पहले घी पी लिया, अब उपदेश दे रहे हैं। सत्ता हाथ में थी, मुंह में माखन था, सत्ता गई तो ज्ञान की मटकी भर गई।”

कांग्रेस की प्रतिक्रिया, इतिहास का हवाला

मुख्यमंत्री के बयान के बाद कांग्रेस की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। कांग्रेस के मध्यप्रदेश प्रभारी और विधायक हरीश चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए ‘नाथी का बाड़ा’ शब्द के नकारात्मक इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। उन्होंने लिखा कि ‘नाथी का बाड़ा’ राजस्थान के इतिहास में समर्पण, सेवा और परोपकार का प्रतीक रहा है।

हरीश चौधरी के अनुसार, नाथी का बाड़ा जोधपुर के त्रिपोलिया बाजार क्षेत्र में नाथी बाई नामक महिला की जमीन पर बना हुआ था। यह ऐसा स्थान था, जहां दूर-दराज से आने वाले जरूरतमंद लोग, जिन्हें ठहरने की जगह नहीं मिलती थी, बिना किसी शुल्क के रुक सकते थे।

आमजन के लिए सेवा का केंद्र था नाथी का बाड़ा

हरीश चौधरी ने अपने पोस्ट में आगे लिखा कि गांवों और आसपास के इलाकों से लकड़ी, घी और अन्य सामान लेकर शहर आने वाले लोग इसी बाड़े में ठहरते थे। यह स्थान आम आदमी के लिए हमेशा खुला और सुलभ रहता था। इसी कारण यह जगह धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गई। उन्होंने कहा कि ऐसे ऐतिहासिक और मानवीय मूल्यों से जुड़े शब्द का सियासी कटाक्ष के रूप में इस्तेमाल करना अनुचित है।

2021 से चला आ रहा है विवाद

‘नाथी का बाड़ा’ से जुड़ा विवाद नया नहीं है। इसकी शुरुआत वर्ष 2021 में पिछली गहलोत सरकार के दौरान हुई थी। उस समय गोविंद सिंह डोटासरा राज्य के शिक्षा मंत्री थे। सीकर स्थित उनके आवास पर कुछ शिक्षक ज्ञापन देने पहुंचे थे। इस दौरान किसी बात पर नाराज होकर डोटासरा ने कथित तौर पर शिक्षकों से कहा था कि स्कूल टाइम में क्यों आए हैं, “नाथी का बाड़ा समझ रखा है क्या?”

इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में जबरदस्त विवाद खड़ा हो गया था। कांग्रेस को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा और ‘नाथी का बाड़ा’ एक सियासी जुमले के रूप में चर्चित हो गया।

सियासी जुमला बन चुका है ‘नाथी का बाड़ा’

2021 के विवाद के बाद से ‘नाथी का बाड़ा’ बार-बार राजनीतिक बहसों में उछलता रहा है। भाजपा नेताओं ने इसे कांग्रेस की कथित अहंकारी राजनीति का प्रतीक बताया, जबकि कांग्रेस नेताओं ने इसे तोड़-मरोड़कर पेश किया गया बयान करार दिया। अब विधानसभा में मुख्यमंत्री के तंज के बाद यह मुद्दा फिर से ताजा हो गया है।

सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस

विधानसभा में उठे इस मुद्दे के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कुछ लोग इसे राजनीतिक व्यंग्य के तौर पर देख रहे हैं, तो कई लोग हरीश चौधरी की तरह इसे ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में जोड़कर देखने की बात कर रहे हैं। ‘नाथी का बाड़ा’ एक बार फिर सियासी बहस का प्रतीक बन गया है।

राजनीति बनाम इतिहास की बहस

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक तंज के लिए किया जाना चाहिए। एक ओर भाजपा इसे कांग्रेस पर हमला करने का जरिया बना रही है, वहीं कांग्रेस इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर बचाव में खड़ी नजर आ रही है।

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