राजस्थान हाई कोर्ट ने जयपुर शहर में फुटपाथ, सड़कों और अन्य सार्वजनिक मार्गों पर अवैध रूप से बने मंदिरों को हटाने को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति बनाए गए किसी भी धार्मिक ढांचे को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। यह आदेश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद बड़ा फैसला
यह मामला जयपुर निवासी सनी मीणा द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में प्रताप नगर सेक्टर-7 क्षेत्र के सार्वजनिक मार्ग पर अवैध रूप से बनाए गए दुकानों और मंदिर का मुद्दा उठाया गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि कुछ लोगों ने फुटपाथ और सड़क पर अतिक्रमण कर पहले दुकानें बनाई और बाद में मंदिर खड़ा कर लिया, जिसके पीछे असल उद्देश्य व्यावसायिक गतिविधियां चलाना था।
नगर निगम को शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश
हाई कोर्ट ने जयपुर नगर निगम आयुक्त को निर्देश दिए हैं कि अगली सुनवाई पर शपथपत्र के माध्यम से यह बताया जाए कि शहर में फुटपाथ, सड़कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बने अवैध मंदिरों को हटाने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि केवल कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्रवाई दिखनी चाहिए।
राज्य सरकार को भी जारी हुए निर्देश
कोर्ट ने राजस्थान सरकार को भी इस मामले में जिम्मेदारी तय करते हुए निर्देश दिए हैं कि अवैध मंदिरों को हटाने और वहां स्थापित मूर्तियों को नजदीकी वैध मंदिरों में स्थानांतरित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। अदालत ने कहा कि धार्मिक आस्था के नाम पर सार्वजनिक रास्तों पर अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है। इस मामले की अगली सुनवाई 4 फरवरी को निर्धारित की गई है।
मंदिर की आड़ में चल रहा था व्यापार
याचिकाकर्ता सनी मीणा ने अदालत को बताया कि जनहित याचिका के बाद नगर निगम ने संबंधित स्थान पर बनी अवैध दुकानों को तो तोड़ दिया, लेकिन मंदिर के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। निगम की ओर से यह दलील दी गई कि मंदिर पुराना है और लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे हटाना उचित नहीं होगा।
हालांकि, याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष हालिया तस्वीरें पेश कीं, जिनसे स्पष्ट हुआ कि मंदिर नया निर्माण है और इसका इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों की आड़ के रूप में किया जा रहा था।
सात दिन में मंदिर हटाने का आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने नगर निगम के डिप्टी आयुक्त को सात दिनों के भीतर मंदिर हटाने और उसमें स्थापित मूर्ति को किसी नजदीकी वैध मंदिर में स्थानांतरित करने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आदेश की अवहेलना हुई तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी नगर निगम की
हाउसिंग बोर्ड की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अजय शुक्ला ने अदालत को बताया कि प्रताप नगर क्षेत्र अब पूरी तरह नगर निगम के अधीन है। ऐसे में निर्माण अनुमति देने और अतिक्रमण हटाने की पूरी जिम्मेदारी नगर निगम की बनती है।
इस पर अदालत ने कहा कि यदि बिना अनुमति के कोई धार्मिक ढांचा बनाया गया है, तो इसके लिए संबंधित अधिकारी भी जवाबदेह होंगे। कोर्ट ने संकेत दिए कि ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच और कार्रवाई भी की जा सकती है।
सार्वजनिक हित सर्वोपरि
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि सार्वजनिक मार्गों, फुटपाथों और सड़कों का उपयोग आम नागरिकों की सुविधा के लिए होता है। धार्मिक या किसी अन्य कारण से इन पर अतिक्रमण करना कानून का उल्लंघन है। अदालत ने यह संदेश दिया कि आस्था के नाम पर नियमों से ऊपर कोई नहीं हो सकता।


