विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 13 जनवरी को जारी किए गए नोटिफिकेशन के विरोध में शुक्रवार को कोटा में सवर्ण समाज के लोगों ने जोरदार प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन विप्र फाउंडेशन के बैनर तले आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने सर्किट हाउस से कलेक्ट्री तक रैली निकाली और जिला कलेक्टर कार्यालय के बाहर नारेबाजी की। इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम ज्ञापन सौंपते हुए UGC के इस नोटिफिकेशन को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग की।
“सरकार समाज में खाई खोदने का काम कर रही है”
प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने आरोप लगाया कि UGC का यह नया नोटिफिकेशन समाज में समानता के नाम पर विभाजन को बढ़ावा देने वाला है। उनका कहना था कि इस तरह के प्रावधानों से विश्वविद्यालय और कॉलेज, जो ज्ञान और बौद्धिक विकास के केंद्र होने चाहिए, वे सामाजिक टकराव के अखाड़े बन सकते हैं। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार एक ओर सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे नियम ला रही है, जो समाज के वर्गों के बीच अविश्वास और भय का वातावरण पैदा कर रहे हैं।
“नए प्रावधान से हिंदू समाज में भय का माहौल”
विप्र फाउंडेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भुवनेश्वर शर्मा ने कहा कि UGC के इस नोटिफिकेशन के बाद समाज के एक बड़े वर्ग में असुरक्षा और भय की भावना पैदा हो गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह नोटिफिकेशन एक तरह से “नया काला कानून” बन सकता है। भुवनेश्वर शर्मा ने कहा कि सरकार एक ओर हिंदू राष्ट्र की बात करती है, लेकिन दूसरी ओर ऐसे फैसले ले रही है, जो हिंदू समाज के भीतर ही विभाजन पैदा कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नए प्रावधानों के तहत जो कमेटियां गठित की गई हैं, उनमें सवर्ण समाज का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।
“भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट नहीं”
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि UGC के नोटिफिकेशन में “भेदभाव” की कोई स्पष्ट और ठोस परिभाषा नहीं दी गई है। इससे यह कानून भविष्य में ब्लैकमेलिंग, उत्पीड़न और निजी दुश्मनी निकालने का हथियार बन सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि बिना स्पष्ट परिभाषा के बनाए गए ऐसे नियमों का दुरुपयोग कर किसी भी व्यक्ति या शिक्षक को बिना समुचित सुनवाई के दोषी ठहराया जा सकता है। इससे शैक्षणिक संस्थानों में डर और अविश्वास का माहौल बनेगा, जो शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक साबित हो सकता है।
“ज्ञान के केंद्र नहीं, टकराव के अखाड़े बन जाएंगे विश्वविद्यालय”
वक्ताओं ने कहा कि यदि इस नोटिफिकेशन को मौजूदा स्वरूप में लागू किया गया, तो विश्वविद्यालय और कॉलेज ज्ञान, शोध और संवाद के केंद्र नहीं रहेंगे। इसके बजाय वे सामाजिक संघर्ष और टकराव के मंच बन सकते हैं। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना होता है, लेकिन यह नोटिफिकेशन विद्यार्थियों के बीच सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देगा और कैंपस का वातावरण तनावपूर्ण बना देगा।
“समानता के नाम पर असंतुलित व्यवस्था स्वीकार नहीं”
सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि समानता के नाम पर किसी एक वर्ग को असीमित अधिकार देना और दूसरे वर्ग को बिना सुनवाई के दोषी ठहराने की व्यवस्था किसी भी लोकतांत्रिक देश में स्वीकार्य नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की आत्मा निष्पक्षता और संतुलन में होती है। यदि किसी भी कानून में सभी वर्गों के लिए समान और न्यायपूर्ण प्रावधान नहीं होंगे, तो वह कानून समाज में असंतोष और टकराव को जन्म देगा।
प्रधानमंत्री से की यह मांग
प्रदर्शन के अंत में सौंपे गए ज्ञापन में सवर्ण समाज और विप्र फाउंडेशन की ओर से स्पष्ट मांग की गई कि: UGC द्वारा 13 जनवरी को जारी किया गया नोटिफिकेशन तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए। जब तक सभी वर्गों के लिए समान, संतुलित और निष्पक्ष व्यवस्था तैयार नहीं की जाती, तब तक इस नोटिफिकेशन के किसी भी प्रावधान को लागू न किया जाए।
आगे आंदोलन की चेतावनी
प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो यह आंदोलन प्रदेश स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा कि सवर्ण समाज अपने अधिकारों और सामाजिक संतुलन की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेगा।


