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राजस्थान हाईकोर्ट में जनवरी से बदला कार्य कैलेंडर, पहला चौथा शनिवार बना वर्किंग डे

राजस्थान हाईकोर्ट में जनवरी से बदला कार्य कैलेंडर, पहला चौथा शनिवार बना वर्किंग डे

राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक कार्य को अधिक प्रभावी और तेज बनाने की दिशा में एक अहम फैसला लागू कर दिया है। पूर्ण पीठ के पूर्व निर्णय के तहत जनवरी 2026 के पहले चौथे शनिवार को हाईकोर्ट में वर्किंग डे घोषित किया गया है। इस संबंध में कॉज लिस्ट भी जारी कर दी गई है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि इस दिन न्यायिक कार्य सामान्य कार्य दिवसों की तरह किया जाएगा और मामलों की नियमित सुनवाई होगी। इस फैसले के लागू होने के साथ ही हाईकोर्ट का कार्य कैलेंडर बदल गया है और शनिवार को अदालत खुलने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।

पहले ही हो चुका था शनिवार को अदालत खोलने का निर्णय

हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। 12 दिसंबर 2025 को हुई फुल कोर्ट बैठक में इस पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया था। उसी बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि जनवरी 2026 से हर महीने के दो शनिवार हाईकोर्ट में कार्य दिवस के रूप में रखे जाएंगे।

इस व्यवस्था के तहत साल भर में कुल 24 अतिरिक्त कार्य दिवस मिलेंगे। अदालत का मानना है कि इन अतिरिक्त कार्य दिवसों से लंबित मामलों के निस्तारण की गति बढ़ेगी और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सुचारू बनाया जा सकेगा।

लंबित मामलों के बढ़ते दबाव से उठाया गया कदम

राजस्थान हाईकोर्ट में पिछले कुछ वर्षों में मुकदमों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। बड़ी संख्या में मामले वर्षों से लंबित हैं, जिससे आम लोगों को समय पर न्याय मिलने में कठिनाई हो रही है। इसी पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट प्रशासन ने न्यायिक समय बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की। अदालत का कहना है कि यदि नियमित कार्य दिवसों के साथ अतिरिक्त दिन जोड़े जाते हैं, तो अधिक मामलों की सुनवाई संभव हो पाएगी। इससे न केवल लंबित मामलों का बोझ कम होगा, बल्कि नए मामलों के निस्तारण में भी तेजी आएगी। प्रशासन का यह भी मानना है कि अतिरिक्त कार्य दिवस न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और उत्तरदायी बनाने में मदद करेंगे।

वकील संगठनों ने जताया था कड़ा विरोध

हालांकि हाईकोर्ट के इस फैसले को लेकर वकील संगठनों में असंतोष भी देखने को मिला। साल की शुरुआत में जयपुर और जोधपुर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के साथ-साथ बार काउंसिल ऑफ राजस्थान ने शनिवार को अदालत खोलने के निर्णय का विरोध किया था।

वकीलों का तर्क था कि शनिवार को कार्य दिवस घोषित करने से अधिवक्ताओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और उनकी पेशेवर व निजी संतुलन प्रभावित होगा। विरोध दर्ज कराने के लिए वकीलों ने एक दिन का स्वैच्छिक कार्य बहिष्कार भी किया था, जिससे न्यायिक कार्य प्रभावित हुआ था।

विवाद को सुलझाने के लिए जजों की कमेटी गठित

वकील संगठनों के विरोध को देखते हुए हाईकोर्ट प्रशासन ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने इस पूरे मुद्दे पर विचार करने के लिए पांच जजों की एक कमेटी गठित की थी। इस कमेटी को शनिवार को अदालत खोलने के फैसले के सभी पहलुओं की समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट सौंपने की जिम्मेदारी दी गई थी। कमेटी ने वकीलों की आपत्तियों, न्यायिक जरूरतों और प्रशासनिक दबावों को ध्यान में रखते हुए अपनी रिपोर्ट तैयार की, जिसे 21 जनवरी तक सौंप दिया गया। हालांकि कमेटी की रिपोर्ट के बावजूद हाईकोर्ट ने अपने मूल निर्णय को लागू करने का संकेत दिया, जिसकी झलक अब पहले चौथे शनिवार को वर्किंग डे घोषित होने से साफ दिखती है।

पहले चौथे शनिवार के वर्किंग डे बनने से फिर गरमाया मुद्दा

जनवरी 2026 के पहले चौथे शनिवार को कार्य दिवस घोषित होते ही यह मामला एक बार फिर गरमा गया है। कई अधिवक्ताओं ने इस फैसले पर नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को ज्ञापन सौंपा है। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव सोगरवाल ने इस पूरे मामले पर विचार करने के लिए एग्जिक्यूटिव कमेटी की बैठक बुलाई है। माना जा रहा है कि इस बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा की जाएगी और यह तय किया जाएगा कि वकील समुदाय इस फैसले पर किस तरह की प्रतिक्रिया देगा।

न्यायिक सुधार बनाम व्यावहारिक चुनौतियां

शनिवार को हाईकोर्ट खोलने का फैसला न्यायिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ व्यावहारिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। जहां एक ओर अदालत प्रशासन इसे लंबित मामलों के समाधान का प्रभावी तरीका बता रहा है, वहीं दूसरी ओर वकील संगठनों को यह व्यवस्था स्वीकार करने में कठिनाई हो रही है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अतिरिक्त कार्य दिवसों से वास्तव में कितनी राहत मिलती है और क्या इससे न्यायिक प्रक्रिया में अपेक्षित तेजी आती है। फिलहाल, राजस्थान हाईकोर्ट में शनिवार को कार्य दिवस का मुद्दा न्यायिक और अधिवक्ता समुदाय दोनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

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