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जालोर में समाज बहिष्कार का मामला: लिव-इन रिलेशनशिप पर 31 लाख का जुर्माना

जालोर में समाज बहिष्कार का मामला: लिव-इन रिलेशनशिप पर 31 लाख का जुर्माना

 जालोर जिले के भीनमाल क्षेत्र से समाज बहिष्कार और आर्थिक दंड का एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मामला सामने आया है। आरोप है कि माली समाज के सात कथित पंचों ने एक युवक के लिव-इन रिलेशनशिप को आधार बनाते हुए न केवल उसके परिवार को समाज से बाहर करने का फैसला सुनाया, बल्कि 31 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना भी लगा दिया। पीड़ित परिवार का कहना है कि इस फैसले के बाद से उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।

लिव-इन रिलेशनशिप से शुरू हुआ पूरा विवाद

पीड़ित बाबुलाल ने पुलिस अधीक्षक को दी गई शिकायत में बताया कि उसका साला एक युवती के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था। दोनों बालिग हैं और आपसी सहमति से साथ रह रहे थे। बाबुलाल के अनुसार, दोनों ने 26 अगस्त 2025 को विधिवत इकरारनामा भी कराया था, ताकि उनके रिश्ते को लेकर कोई कानूनी विवाद न खड़ा हो। हालांकि, इस रिश्ते से समाज के कुछ लोग और युवती के परिजन नाराज हो गए। आरोप है कि इसके बाद दोनों को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उनकी सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगा।

हाईकोर्ट से मांगा संरक्षण, मिले सुरक्षा के निर्देश

लगातार मिल रही धमकियों से परेशान होकर युवक और युवती ने जोधपुर हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित पुलिस अधिकारियों को दोनों को सुरक्षा और संरक्षण देने के निर्देश जारी किए। कोर्ट के आदेश के बावजूद पीड़ित परिवार का आरोप है कि समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों ने भीनमाल में पंचायत बुलाकर मनमाने फैसले थोप दिए।

पंचायत में 31 लाख रुपये जुर्माने का आरोप

पीड़ितों के अनुसार, भीनमाल में आयोजित कथित पंचायत में बाबुलाल के साले पर 31 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया। इतना ही नहीं, उसकी मदद करने वाले रिश्तेदार साडू पांचाराम माली को भी समाज से बहिष्कृत कर दिया गया और हुक्का-पानी बंद करने का फरमान सुना दिया गया। आरोप है कि पंचायत के फैसले का विरोध करने पर पूरे परिवार को समाज से बाहर करने की धमकी दी गई। पंचायत के इन फैसलों ने परिवार को सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया।

विरोध करने पर बढ़ी प्रताड़ना और सामाजिक अपमान

पांचाराम माली ने बताया कि पंचायत के फैसले के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें और उनके परिवार को सामाजिक अपमान और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। आरोप है कि समाज में दोबारा शामिल होने के लिए उन पर 11 लाख रुपये देने का दबाव बनाया जा रहा है। पीड़ितों का कहना है कि समाज से बहिष्कार का डर दिखाकर उन्हें चुप कराने की कोशिश की जा रही है। बच्चों और महिलाओं तक को धमकियों और तानों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे परिवार का सामान्य जीवन प्रभावित हो गया है।

थाने में रिपोर्ट के बाद भी नहीं थमी धमकियां

पंचायत के कथित फैसलों से परेशान होकर पीड़ित परिवार ने 9 जनवरी को भीनमाल थाने में सात कथित पंचों के खिलाफ लिखित रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट दर्ज होने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि स्थिति सुधरेगी, लेकिन आरोप है कि इसके उलट धमकियां और तेज हो गईं। पीड़ितों का कहना है कि 20 जनवरी को पुलिस के सामने बयान देने के बाद कथित पंचों ने और ज्यादा दबाव बनाना शुरू कर दिया। आरोप लगाया गया कि उनसे और बड़ा जुर्माना लगाने तथा पूरी तरह समाज से बाहर करने की धमकी दी गई।

एसपी के सामने न्याय की गुहार

लगातार मिल रही धमकियों और प्रताड़ना से तंग आकर बुधवार को पीड़ित परिवार और उनके रिश्तेदार जालोर पहुंचे। उन्होंने पुलिस अधीक्षक शैलेन्द्र सिंह के समक्ष पेश होकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जान-माल की सुरक्षा की मांग की। पीड़ित परिवार का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो उनके साथ कोई भी गंभीर घटना घट सकती है। उन्होंने प्रशासन से यह भी मांग की कि समाज बहिष्कार जैसी कुप्रथा पर सख्ती से रोक लगाई जाए।

पुलिस ने शुरू की जांच, सुरक्षा का आश्वासन

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि भीनमाल थाने में दर्ज रिपोर्ट के आधार पर मामले की जांच शुरू कर दी गई है। सभी आरोपों की निष्पक्षता से जांच की जा रही है और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। पुलिस ने पीड़ित परिवार को आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने का भी आश्वासन दिया है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति या समूह को कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

समाज बहिष्कार पर फिर उठा सवाल

यह मामला एक बार फिर समाज बहिष्कार और पंचायतों के कथित फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बालिगों के लिव-इन रिलेशनशिप जैसे निजी फैसलों को लेकर सामाजिक दंड और आर्थिक जुर्माना लगाना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है। जालोर का यह मामला न केवल पीड़ित परिवार के लिए, बल्कि समाज में कानून और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर भी एक अहम उदाहरण बनता जा रहा है।

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