राजस्थान विधानसभा के आगामी सत्र से पहले जारी किए गए दिशानिर्देशों को लेकर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे आरोपों और तीखी आलोचना पर विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने रविवार को खुलकर जवाब दिया। उन्होंने विपक्ष पर “झूठा नैरेटिव” गढ़ने का आरोप लगाते हुए कहा कि लंबे समय से चली आ रही संसदीय प्रक्रियाओं को नया और अभूतपूर्व बताकर भ्रम फैलाया जा रहा है। जयपुर में आयोजित एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए स्पीकर देवनानी ने साफ शब्दों में कहा कि सत्र से पहले कोई नए नियम लागू नहीं किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह धारणा पूरी तरह गलत है कि विधायकों पर किसी तरह की नई पाबंदियां लगाई गई हैं।
“लोकतंत्र की हत्या” के आरोपों पर तीखा जवाब
स्पीकर देवनानी ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “लोकतंत्र की हत्या” जैसे आरोप बेहद गंभीर हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र कैसे कमजोर होता है, यह पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बेहतर जानते होंगे। हालांकि, देवनानी ने यह भी स्पष्ट किया कि वे गहलोत का सम्मान करते हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि सत्र से पहले जारी बुलेटिन को ठीक से पढ़े बिना ही बयान दिए गए हैं। देवनानी ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के आसन की गरिमा बनाए रखना सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है और उसकी व्यवस्थाओं पर सवाल उठाना संसदीय परंपराओं के अनुरूप नहीं है।
अशोक गहलोत ने क्यों जताई थी आपत्ति
इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी दिशानिर्देशों को “अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण” बताते हुए कहा था कि ये संसदीय लोकतंत्र की भावना के खिलाफ हैं। गहलोत का तर्क था कि एक विधायक केवल अपने क्षेत्र का नहीं, बल्कि पूरे राज्य का प्रतिनिधि होता है। ऐसे में राज्य स्तरीय नीतिगत मुद्दों या पांच साल से पुराने मामलों पर सवाल पूछने पर रोक और मंत्रियों की जवाबदेही में ढील देना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि विधायकों को सवाल पूछने से रोकना और मंत्रियों को जांच से बचाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
कोई नया प्रावधान नहीं, परंपराओं के अनुसार ही सत्र
इन आरोपों का जवाब देते हुए स्पीकर देवनानी ने स्पष्ट किया कि 16वीं राजस्थान विधानसभा के पांचवें सत्र के दौरान सदन की कार्यप्रणाली में कोई नया प्रावधान नहीं किया गया है। विधायकों के लिए जारी किए गए सभी बुलेटिन पूर्ववर्ती विधानसभाओं की परंपराओं और नियमों के अनुरूप हैं। उन्होंने कहा कि प्रश्नकाल, शून्यकाल, सवाल पूछने की प्रक्रिया और अन्य संसदीय व्यवस्थाओं में कोई बदलाव नहीं किया गया है। विधानसभा सत्र स्वस्थ और सशक्त संसदीय परंपराओं के तहत ही संचालित होगा।
सवालों की स्वीकार्यता के नियम पहले जैसे ही
देवनानी ने बताया कि सवालों की स्वीकार्यता से जुड़े नियम भी पूरी तरह अपरिवर्तित हैं। ये नियम 25 जनवरी 2020 को जारी बुलेटिन संख्या-20 के अनुरूप हैं, जिन्हें तत्कालीन स्पीकर के निर्देशों के तहत लागू किया गया था। सवालों की संख्या या सीमा में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है। विधानसभा नियमों के अनुसार सवाल अत्यधिक लंबे, बहुत व्यापक या ऐसे नहीं होने चाहिए, जिनका निर्धारित प्रारूप में उत्तर देना संभव न हो। यही कारण है कि कुछ मामलों में सवालों को अस्वीकार किया जाता है।
पांच साल से पुराने मामलों पर सवाल क्यों नहीं
पांच साल से पुराने मामलों पर जानकारी न मांगने की परंपरा पर भी स्पीकर ने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य विभागों से समय पर और तथ्यात्मक जवाब सुनिश्चित करना है। पुराने मामलों में अक्सर रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होते, जिससे जवाब देने में अनावश्यक देरी होती है।
‘तुच्छ’ शब्द पर भी दी सफाई
‘तुच्छ’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर उठे सवालों पर देवनानी ने कहा कि मामूली या तुच्छ विषयों पर सवाल न पूछने का प्रावधान कोई नया नहीं है। यह नियम राजस्थान विधानसभा में वर्ष 1956 से और लोकसभा में 1952 से लागू है। देशभर की विधानसभाओं में इस परंपरा को समान रूप से अपनाया जाता रहा है। उन्होंने दोहराया कि बुलेटिन समय-समय पर विधानसभा प्रक्रिया संबंधी नियमावली के नियम 37 के तहत ही जारी किए जाते हैं। हाल ही में केवल सवालों और पर्चियों के डिजिटलीकरण से जुड़ा बदलाव किया गया है, जिसे तकनीकी सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए।
स्वस्थ संसदीय परंपराओं पर जोर
स्पीकर देवनानी ने कहा कि विधानसभा लोकतंत्र का मंदिर है और यहां स्वस्थ बहस, सवाल-जवाब और जवाबदेही की परंपरा को बनाए रखना सभी का दायित्व है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगामी सत्र सकारात्मक माहौल में चलेगा और प्रदेश के हित से जुड़े मुद्दों पर सार्थक चर्चा होगी।


