जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में प्रसिद्ध गीतकार, पटकथा लेखक और सामाजिक विचारक जावेद अख़्तर ने सिनेमा, समाज और साहित्य से जुड़े अहम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी। ‘जावेद अख़्तर पॉइंट्स ऑफ व्यू’ सत्र में राइटर वरीशा फरासत के साथ संवाद के दौरान उन्होंने फिल्मों और वेब सीरीज़ में बढ़ती हिंसा, सेक्युलरिज़्म की समझ, नई पीढ़ी में साहित्य के प्रति घटती रुचि और फिल्म इंडस्ट्री में आए बदलावों पर विस्तार से बात की। जावेद अख़्तर के विचारों को श्रोताओं ने गंभीरता से सुना और उनके अनुभवों से भरे जवाबों ने सत्र को खास बना दिया।
फिल्मों और वेब सीरीज़ में बढ़ती हिंसा पर चिंता
सिनेमा और वेब कंटेंट में बढ़ती हिंसा को लेकर पूछे गए सवाल पर जावेद अख़्तर ने कहा कि यह संभव है कि दर्शक लगातार ऐसा कंटेंट देख रहे हों और जब वे अपने हीरो से भी उसी तरह के व्यवहार की उम्मीद करने लगते हैं, तो उसका असर समाज पर पड़ता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि उसका समाज पर गहरा प्रभाव होता है। जावेद अख़्तर ने कहा कि सिनेमा समाज से ही निकलता है और समाज में हो रहे बदलावों के साथ-साथ सिनेमा भी बदलता रहा है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दर्शकों की पसंद और अपेक्षाएं कंटेंट को दिशा देती हैं, लेकिन रचनाकारों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सेक्युलरिज़्म कोई क्रैश कोर्स नहीं है
सत्र के दौरान सेक्युलरिज़्म पर अपनी राय रखते हुए जावेद अख़्तर ने कहा कि सेक्युलरिज़्म का कोई क्रैश कोर्स नहीं होता। उन्होंने कहा कि अगर कोई इसे सिखाने की कोशिश करेगा तो वह बनावटी होगा। सेक्युलरिज़्म इंसान को उसके आसपास के माहौल, संस्कारों और अनुभवों से मिलता है। उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्हें सेक्युलर सोच अपने नाना और नानी से मिली। वे पढ़े-लिखे नहीं थे और अवधी भाषा में बात करते थे, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी और इंसानियत के मूल्य सिखाए। जावेद अख़्तर ने कहा कि यही असली सेक्युलरिज़्म है, जो बिना किसी प्रचार के जीवन का हिस्सा बन जाता है।
नई पीढ़ी में साहित्य के प्रति घटती रुचि पर टिप्पणी
आज की पीढ़ी में साहित्य के प्रति घटती रुचि को लेकर जावेद अख़्तर ने समाज और परिवार की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब माता-पिता की खुद साहित्य में रुचि नहीं होती, तो बच्चों में पढ़ने की आदत कैसे विकसित होगी। उन्होंने यह भी कहा कि पढ़ने की आदत स्कूल से ज्यादा घर के माहौल से आती है। अगर घर में किताबें हों, बातचीत में साहित्य और विचार हों, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से पढ़ने की ओर आकर्षित होते हैं। केवल पाठ्यक्रम के सहारे साहित्यिक रुचि पैदा नहीं की जा सकती।
फिल्म इंडस्ट्री अब ज्यादा मैच्योर और ऑर्गनाइज
फिल्म इंडस्ट्री में आए बदलावों पर बोलते हुए जावेद अख़्तर ने कहा कि आज की इंडस्ट्री पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मैच्योर और ऑर्गनाइज हो चुकी है। उन्होंने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि जब वे असिस्टेंट डायरेक्टर थे, तब उन्हें जूते-चप्पल लाने जैसे काम भी करने पड़ते थे। उन्होंने कहा कि उस दौर में असिस्टेंट डायरेक्टर्स की कोई पहचान नहीं होती थी, लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब फर्स्ट असिस्टेंट डायरेक्टर का नाम अभिनेता के बाद प्रमुखता से लिया जाता है, जो इंडस्ट्री में प्रोफेशनलिज़्म के बढ़ने का संकेत है।
संगीत और गणमान्य अतिथियों के साथ फेस्टिवल की शुरुआत
इससे पहले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत होटल क्लार्क्स आमेर में ‘मॉर्निंग म्यूजिक: नाद बिटवीन साउंड एंड साइलेंस’ सत्र से हुई। इस सत्र में ऐश्वर्या विद्या रघुनाथन ने शास्त्रीय संगीत की मनमोहक प्रस्तुति दी। फेस्टिवल का उद्घाटन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी और प्रेमचंद बैरवा ने आयोजकों के साथ किया। उद्घाटन सत्र में साहित्य, कला और संस्कृति के महत्व पर भी चर्चा की गई।


