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कैसे पड़ा लोहड़ी का नाम, क्यों है यह पर्व इतना खास? जानिए इसका इतिहास और सांस्कृतिक महत्व

कैसे पड़ा लोहड़ी का नाम, क्यों है यह पर्व इतना खास? जानिए इसका इतिहास और सांस्कृतिक महत्व

भारत के लोकपर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, समाज और जीवनशैली से गहराई से जुड़े होते हैं। लोहड़ी ऐसा ही एक प्रमुख लोकपर्व है, जो खासतौर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के कई हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार सर्दियों के अंतिम चरण और नई फसल की उम्मीदों का प्रतीक माना जाता है। लोहड़ी किसानों के लिए मेहनत के फल और आने वाले समय की खुशहाली का उत्सव है।

लोहड़ी क्या है?

लोहड़ी हर वर्ष पंजाबी कैलेंडर के पौष महीने की 13वीं तिथि को मनाई जाती है, जो आमतौर पर जनवरी के मध्य में पड़ती है। यह पर्व मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। लोहड़ी को सर्दी के मौसम की विदाई और रबी की फसल के स्वागत के रूप में देखा जाता है। इस दिन लोग घरों के बाहर या खुले मैदान में अग्नि प्रज्वलित करते हैं और उसके चारों ओर एकत्र होकर लोकगीत गाते हैं। गुड़, तिल, मूंगफली, रेवड़ी और पॉपकॉर्न अग्नि में अर्पित किए जाते हैं, जिसे भोग माना जाता है।

लोहड़ी का ऐतिहासिक संदर्भ

लोहड़ी का इतिहास कृषि प्रधान समाज से जुड़ा हुआ माना जाता है। पुराने समय में जब सर्दियों में दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती थीं, तब सूर्य की ऊर्जा के लौटने की कामना के साथ अग्नि पूजा की जाती थी। मान्यता है कि लोहड़ी सूर्य देव और अग्नि देव को समर्पित पर्व है। अग्नि को जीवन, ऊर्जा और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व के माध्यम से लोग अपने दुख, नकारात्मकता और बीते कष्टों को पीछे छोड़ने का संकल्प लेते हैं।

लोहड़ी नाम की उत्पत्ति कैसे हुई?

‘लोहड़ी’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह शब्द ‘लोह’ से निकला है, जिसका संबंध गर्मी और अग्नि से है। वहीं, एक अन्य मत के अनुसार ‘लोहड़ी’ शब्द ‘तिलोड़ी’ या ‘लोहा-दी’ से विकसित हुआ है, जो फसल कटाई के बाद किसानों की खुशी और उत्सव को दर्शाता है। इन सभी मान्यताओं में गर्मी, प्रकाश और समृद्धि का भाव समान रूप से मौजूद है।

दुल्ला भट्टी की लोककथा और लोहड़ी

लोहड़ी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथा दुल्ला भट्टी की है। मुगल काल में दुल्ला भट्टी को पंजाब का नायक माना जाता था। कहा जाता है कि उन्होंने सुंदरी और मुंदरी नाम की दो लड़कियों को गुलामी से बचाकर उनकी शादी करवाई थी। दुल्ला भट्टी ने स्वयं भाई की भूमिका निभाते हुए कन्यादान किया और शगुन में शक्कर दी। यही कारण है कि आज भी लोहड़ी के गीतों में उनका नाम लिया जाता है और “सुंदर मुंदरिये हो” गीत गाया जाता है।

लोहड़ी कैसे मनाई जाती है?

लोहड़ी की रात लोग नए कपड़े पहनकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं। भांगड़ा और गिद्दा जैसे पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं। बच्चे घर-घर जाकर लोकगीत गाते हैं और प्रसाद इकट्ठा करते हैं। इस दिन मक्की की रोटी और सरसों का साग विशेष रूप से बनाए जाते हैं। पूरा वातावरण उत्सव और सामूहिक खुशी से भर जाता है।

लोहड़ी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामूहिकता, सकारात्मक सोच और परंपरा का प्रतीक है। यह पर्व सिखाता है कि मेहनत के बाद खुशियां मनाना जरूरी है। लोहड़ी परिवार, समाज और संस्कृति को जोड़ने वाला ऐसा पर्व है, जो पीढ़ियों से लोगों के जीवन में उत्साह और ऊर्जा भरता आ रहा है।

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