मकर संक्रांति को लेकर गुलाबी नगरी जयपुर पूरी तरह तैयार है। शहर की छतों पर एक बार फिर पतंगों की जंग देखने को मिलेगी, जहां ‘वो काटा’ की गूंज के साथ आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाएगा। इस बार खास बात यह है कि जयपुर के आसमान में सिर्फ पतंगें नहीं, बल्कि देश-दुनिया की राजनीति के बड़े चेहरे भी उड़ते नजर आएंगे। रामगंज के हांडीपुरा और जगन्नाथ शाह के रास्ते से निकलने वाली पतंगें पूरे देश में संक्रांति का रंग बिखेरने के लिए तैयार हैं।
रामगंज बना देश का सबसे बड़ा पतंग बाजार
जयपुर का जगन्नाथ शाह का रास्ता और रामगंज इलाका आज देश का सबसे बड़ा ‘काइट हब’ माना जाता है। इन संकरी गलियों में बनने वाली पतंगों की सप्लाई बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और तमिलनाडु तक होती है। हांडीपुरा, नाहरवाड़ा और आसपास के मोहल्लों में करीब 500 से ज्यादा परिवार दिन-रात मेहनत कर पतंगें तैयार कर रहे हैं। मकर संक्रांति से पहले यहां का हर घर एक छोटी फैक्ट्री में तब्दील हो जाता है।
आसमान में दिखेगी सियासत की झलक
इस साल जयपुर की पतंगबाजी में सियासत का रंग खास तौर पर देखने को मिलेगा। पिछले 42 साल से सियासी पतंगें बना रहे कारीगर यूसुफ अंसारी ने बताया कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की तस्वीरों वाली पतंगों की भारी मांग है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी जयपुर के आसमान में दिखाई देगी। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पतंगें भी बाजार में छाई हुई हैं। पतंगबाज इन चेहरों को पेंच लड़ाकर मजेदार अंदाज में ‘वर्ल्ड पॉलिटिक्स’ का मजा लेने को तैयार हैं।
देसी मांझे का बढ़ा चलन
इस बार जयपुर में जानलेवा चाइनीज मांझे के बजाय देसी सूती मांझे को प्राथमिकता दी जा रही है। हांडीपुरा के कारीगरों ने खास तरीके से ऐसा मांझा तैयार किया है, जो पेंच काटने में कारगर होने के साथ-साथ पक्षियों और लोगों के लिए सुरक्षित है। प्रशासन की सख्ती और लोगों की जागरूकता के चलते देसी मांझे की मांग तेजी से बढ़ी है। बच्चों के लिए हल्की पतंगें, खिलौना लगी पतंगें और रात में उड़ने वाले ‘विश लैम्प’ भी बाजार में खूब बिक रहे हैं।
राजा-महाराजाओं से जुड़ा है पतंगबाजी का इतिहास
जयपुर में पतंगबाजी का इतिहास राजा-महाराजाओं के दौर से जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार 1835 के आसपास महाराजा रामसिंह स्वयं पतंगबाजी के शौकीन थे। उन्हीं के शासनकाल में बेहतरीन पतंग कारीगरों को जयपुर में बसाया गया। उस समय कागज की जगह मलमल के कपड़े से पतंगें बनाई जाती थीं। कहा जाता है कि जयपुर के पुराने पतंगबाज इतने माहिर थे कि वे कुएं के अंदर खड़े होकर भी पतंग उड़ा लेते थे। आज भी सिटी पैलेस में उस दौर की विशाल चरखियां और पारंपरिक पतंगें इस विरासत की गवाही देती हैं।
बाजारों में उमड़ा उत्साह, छतों पर तैयारियां पूरी
मकर संक्रांति से पहले जयपुर के बाजारों में भारी भीड़ देखने को मिल रही है। हर रंग, हर डिजाइन और हर साइज की पतंगों से दुकानें भरी हुई हैं। युवाओं में खास डिजाइनर और थीम बेस्ड पतंगों का क्रेज साफ नजर आ रहा है। जैसे ही संक्रांति का दिन आएगा, जयपुर की छतें जंग का मैदान बन जाएंगी और आसमान ‘वो काटा’ के शोर से गूंज उठेगा।


