मनीषा शर्मा। केंद्र सरकार ने नागौर की विशिष्ट पहचान और उत्कृष्ट औषधीय गुणों से भरपूर ‘नागौरी अश्वगंधा’ को आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग प्रदान कर दिया है। यह उपलब्धि न केवल नागौर जिले बल्कि पूरे मारवाड़ क्षेत्र के किसानों के लिए ऐतिहासिक और गर्व का विषय है। सोजत की मेहंदी के बाद कृषि श्रेणी में यह राजस्थान का दूसरा बड़ा उत्पाद है, जिसे GI टैग मिला है। इस मान्यता के साथ नागौर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नए कृषि और औषधीय ब्रांड के रूप में स्थापित हो गया है।
GI टैग से शुद्धता और गुणवत्ता को मिली कानूनी मान्यता
नागौरी वेलफेयर सोसाइटी के मेंटर अमन चौधरी ने इसे नागौरी अश्वगंधा की शुद्धता और गुणवत्ता पर केंद्र सरकार की अंतिम मुहर बताया। उन्होंने कहा कि GI टैग मिलने से इस उत्पाद को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और इसके नाम का दुरुपयोग नहीं किया जा सकेगा। अब कोई अन्य क्षेत्र या व्यापारी ‘नागौरी अश्वगंधा’ के नाम से मिलावटी या कम गुणवत्ता वाला उत्पाद नहीं बेच सकेगा। इससे किसानों को उनकी उपज का वास्तविक और उचित मूल्य मिलने का रास्ता साफ होगा।
नागौर की जलवायु ने बनाया अश्वगंधा को खास
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार नागौर की शुष्क जलवायु और रेतीली मिट्टी अश्वगंधा की खेती के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती है। यही कारण है कि नागौर में उगाई गई अश्वगंधा की जड़ें अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक पुष्ट, लंबी और औषधीय तत्वों से भरपूर होती हैं। विशेष रूप से इसमें पाए जाने वाले एल्कलॉइड्स की मात्रा अधिक होती है, जो इसे औषधीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। इसके फल यानी बेरी का गहरा चमकीला लाल रंग इसकी उच्च गुणवत्ता का स्पष्ट प्रमाण माना जाता है। इन्हीं विशिष्ट खूबियों के आधार पर केंद्र सरकार ने ‘नागौरी अश्वगंधा’ को GI टैग प्रदान कर इसकी भौगोलिक और औषधीय पहचान को संरक्षित किया है।
किसानों के लिए आर्थिक खुशहाली के नए रास्ते
GI टैग मिलने से नागौर जिले के हजारों किसानों के लिए आर्थिक खुशहाली के नए अवसर खुलने की उम्मीद है। अब वैश्विक बाजार में ‘नागौरी अश्वगंधा’ नाम सुरक्षित रहेगा और मिलावट पर प्रभावी रोक लगेगी। इससे किसानों को उनकी फसल की बेहतर कीमत मिलेगी और बिचौलियों की भूमिका सीमित होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग के बाद अंतरराष्ट्रीय दवा और आयुर्वेदिक कंपनियां सीधे नागौर के किसानों से संपर्क करेंगी। इससे निर्यात में वृद्धि होगी और अश्वगंधा के दामों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है। इसके साथ ही क्षेत्र में प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
GI टैग के पीछे सामूहिक प्रयासों की अहम भूमिका
इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के पीछे नागौरी वेलफेयर सोसाइटी की निदेशक पारुल चौधरी के निरंतर और समर्पित प्रयासों की बड़ी भूमिका रही है। उन्होंने लंबे समय तक जमीनी स्तर पर काम करते हुए GI टैग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। इसके साथ ही ICAR आनंद (गुजरात) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. परमेश्वरलाल सारण और राज्य कृषि विभाग ने तकनीकी सहयोग और आवश्यक आंकड़े उपलब्ध कराकर इस मिशन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राजस्थान का 22वां GI प्रमाणित उत्पाद
नागौरी अश्वगंधा के GI सूची में शामिल होने के साथ ही राजस्थान के GI प्रमाणित उत्पादों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है। इससे पहले बीकानेरी भुजिया, मकराना मार्बल, कोटा डोरिया, सोजत मेहंदी जैसे प्रसिद्ध उत्पाद पहले से ही GI टैग प्राप्त कर चुके हैं। यह उपलब्धि राजस्थान की पारंपरिक और विशिष्ट कृषि एवं हस्तशिल्प पहचान को और मजबूत करती है।
GI टैग से क्या होंगे सीधे फायदे
GI टैग मिलने के बाद ‘नागौरी अश्वगंधा’ का नाम पूरी तरह सुरक्षित हो गया है। इससे कोई भी व्यापारी या संस्था इसका गलत तरीके से इस्तेमाल नहीं कर सकेगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अब केवल प्रमाणित नागौरी अश्वगंधा ही बेची जा सकेगी, जिससे गुणवत्ता बनी रहेगी और मिलावट कम होगी। औषधीय गुणों वाली इस फसल की बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है। एक एकड़ भूमि से कई क्विंटल जड़ें प्राप्त की जा सकती हैं। बेहतर कीमत मिलने पर किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। वर्तमान में देशभर में अश्वगंधा की खेती लगभग 5,000 हेक्टेयर भूमि में होती है, जिससे करीब 1,600 टन उत्पादन होता है। इसमें लगभग 10 प्रतिशत योगदान अकेले नागौर जिले का है, जो इसकी अहमियत को दर्शाता है।
आगे की रणनीति और किसानों को मिलेगा सहयोग
नागौरी वेलफेयर सोसाइटी के मेंटर अमन चौधरी ने कहा कि अब संस्था और कृषि विभाग मिलकर प्रयास करेंगे कि इस उत्पाद को अधिक से अधिक किसानों के खेतों तक पहुंचाया जाए। इसके लिए किसानों को जागरूक किया जाएगा, तकनीकी सहायता और उन्नत बीज उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि इसकी गुणवत्ता और पैदावार दोनों में सुधार हो सके। कुल मिलाकर, GI टैग मिलने से नागौरी अश्वगंधा न केवल नागौर की पहचान बनेगी, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने और राजस्थान को औषधीय खेती के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक ले जाने में भी अहम भूमिका निभाएगी।


