राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक बेशकीमती जमीन को लेकर करीब 14 साल बाद एक बार फिर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। जयपुर के हथरोई गांव से जुड़ा यह मामला लगभग 400 करोड़ रुपये मूल्य की भूमि से संबंधित है, जिस पर लंबे समय से जयपुर विकास प्राधिकरण और जयपुर के पूर्व राजपरिवार के बीच कानूनी लड़ाई चल रही है। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद में अहम हस्तक्षेप करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के 14 साल पुराने आदेश को रद्द कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश क्यों किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन शामिल थे, ने यह माना कि राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 2011 में JDA की अपील को केवल तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था, जो न्यायोचित नहीं था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी महत्वपूर्ण भूमि विवाद को केवल प्रक्रियात्मक या तकनीकी कारणों से सुने बिना खारिज करना उचित नहीं है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के पुराने फैसले को रद्द करते हुए मामले को दोबारा खोलने का आदेश दिया।
क्या है हथरोई गांव की विवादित जमीन का मामला
यह विवाद जयपुर के हथरोई गांव की उस जमीन से जुड़ा है, जो समय के साथ जयपुर शहर के प्रमुख शहरी इलाकों में शामिल हो चुकी है। वर्तमान में इस भूमि पर रिहायशी कॉलोनियां, शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल और अन्य नागरिक सुविधाएं विकसित हो चुकी हैं। भूमि के व्यावसायिक और शहरी महत्व को देखते हुए इसकी मौजूदा बाजार कीमत लगभग 400 करोड़ रुपये आंकी जा रही है।
2011 में हाईकोर्ट ने क्या दिया था फैसला
इस मामले में वर्ष 2005 में जयपुर के पूर्व राजपरिवार की ओर से सिविल सूट दायर किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उस समय जमीन को पूर्व राजपरिवार की निजी संपत्ति मानते हुए उनके पक्ष में फैसला दिया था। इसके खिलाफ जयपुर विकास प्राधिकरण ने हाईकोर्ट में पहली अपील दाखिल की थी। हालांकि, राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 2011 में JDA की अपील को तकनीकी कारणों के चलते सुनने से इनकार कर दिया और ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट के पुराने आदेश पर क्यों उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट द्वारा अपील को मेरिट के आधार पर सुने बिना खारिज करना गंभीर त्रुटि थी। शीर्ष अदालत का कहना है कि जब मामला करोड़ों रुपये की सार्वजनिक भूमि और शहरी विकास से जुड़ा हो, तो न्यायालय को सभी पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनना चाहिए था। इसी वजह से हाईकोर्ट के 2011 के आदेश को अब अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया गया है।
JDA का दावा: सरकारी ‘सिवायचक’ जमीन
जयपुर विकास प्राधिकरण का कहना है कि यह भूमि राजस्व रिकॉर्ड में ‘सिवायचक’ के रूप में दर्ज है, जिसका अर्थ है कि यह सरकारी अनुत्पादक भूमि है। JDA के अनुसार, यह जमीन कभी भी पूर्व राजपरिवार की निजी संपत्ति नहीं रही। प्राधिकरण का यह भी दावा है कि वर्ष 1949 में जब जयपुर रियासत का भारत में विलय हुआ था, तब हुए किसी भी समझौते में इस जमीन को निजी संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं किया गया था।
पूर्व राजपरिवार की दलील
वहीं, जयपुर के पूर्व राजपरिवार का दावा इससे बिल्कुल उलट है। उनका कहना है कि यह भूमि उनकी निजी मिल्कियत थी और बाद में प्रशासन ने अवैध रूप से इस पर कब्जा कर लिया। इसी आधार पर उन्होंने वर्ष 2005 में सिविल सूट दायर किया था। पूर्व राजपरिवार का तर्क है कि ऐतिहासिक दस्तावेज और पुराने रिकॉर्ड उनके स्वामित्व की पुष्टि करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट को निर्देश दिए हैं कि वह JDA की पहली अपील पर चार सप्ताह के भीतर मेरिट के आधार पर सुनवाई करे। इसका मतलब यह है कि अब हाईकोर्ट को तकनीकी पहलुओं से हटकर जमीन के वास्तविक स्वामित्व और कानूनी स्थिति पर फैसला करना होगा।
जयपुर के शहरी विकास पर पड़ सकता है असर
इस फैसले को जयपुर की सबसे बड़ी और अहम भूमि कानूनी लड़ाइयों में से एक माना जा रहा है। यदि जमीन का स्वामित्व बदलता है, तो इसका सीधा असर जयपुर के शहरी विकास, नियोजन और प्रशासनिक अधिकारों पर पड़ सकता है। साथ ही, इस भूमि पर पहले से विकसित आवासीय और सार्वजनिक ढांचे की वैधता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट पर
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब यह मामला फिर से राजस्थान हाईकोर्ट में जाएगा। यहां दोनों पक्ष अपने-अपने दस्तावेज, दावे और कानूनी तर्क पेश करेंगे। इस मामले का फैसला न केवल JDA और पूर्व राजपरिवार के लिए, बल्कि जयपुर शहर के भविष्य और शहरी भूमि प्रबंधन के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है।


