शोभना शर्मा। राजस्थान में कोविड-19 महामारी के दौरान स्कूली बच्चों के लिए चलाई गई मिड-डे-मील योजना अब राज्य के सबसे बड़े कथित घोटालों में से एक के रूप में सामने आई है। उस समय जब स्कूल बंद थे और बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने घर-घर कॉम्बो पैक वितरण की योजना बनाई थी, उसी दौरान इस योजना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की जांच में खुलासा हुआ है कि इस योजना के नाम पर राज्य सरकार को करीब 2000 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया गया।
कोविड काल में राज्य सरकार ने मिड-डे-मील योजना के तहत स्कूली बच्चों को दाल, तेल, मसाले सहित अन्य खाद्य सामग्री के कॉम्बो पैक उपलब्ध कराने का निर्णय लिया था। इस पूरी आपूर्ति व्यवस्था की जिम्मेदारी राजस्थान राज्य सहकारी उपभोक्ता संघ, यानी कॉनफैड (CONFED), को सौंपी गई थी। दावा किया गया था कि यह सामग्री एफएसएसएआई और एगमार्क मानकों के अनुरूप होगी, ताकि बच्चों के पोषण से कोई समझौता न हो। लेकिन जांच में सामने आया कि कागजों में दिखाए गए मानक जमीनी हकीकत से कोसों दूर थे।
ACB की प्राथमिक और विस्तृत जांच में यह बात सामने आई कि योजना से जुड़े सरकारी अधिकारी और कॉनफैड के वरिष्ठ पदाधिकारी आपसी मिलीभगत से नियमों में बदलाव करते रहे। टेंडर प्रक्रिया को इस तरह बदला गया कि योग्य और पात्र फर्मों को बाहर कर दिया गया, जबकि पसंदीदा निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। कई मामलों में बिना किसी वास्तविक आपूर्ति के ही फर्जी बिल तैयार कर भुगतान उठा लिया गया। कहीं-कहीं नाममात्र की आपूर्ति दिखाकर करोड़ों रुपये निकाल लिए गए।
जांच में यह भी सामने आया कि जिन फर्मों को टेंडर दिए गए, उन्होंने आगे अवैध रूप से काम अन्य संस्थाओं को सबलेट कर दिया। इसके जरिए फर्जी सप्लायरों और ट्रांसपोर्टरों का एक संगठित नेटवर्क खड़ा किया गया, जो केवल कागजों में ही सामग्री की खरीद और आपूर्ति दिखाता रहा। इस पूरे नेटवर्क के जरिए सरकारी खजाने को भारी चपत लगाई गई।
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने इस मामले में कॉनफैड और निजी फर्मों से जुड़े कुल 21 आरोपियों को नामजद किया है। इनमें सहायक लेखाधिकारी, प्रबंधक, सहायक प्रबंधक, सुपरवाइजर, गोदाम कीपर और रीजनल मैनेजर जैसे पदों पर कार्यरत अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा तिरूपति सप्लायर्स, जागृत एंटरप्राइजेज, एमटी एंटरप्राइजेज और साई ट्रेडिंग जैसी निजी संस्थाओं को भी इस घोटाले में आरोपी बनाया गया है।
एफआईआर में जिन प्रमुख अधिकारियों के नाम शामिल हैं, उनमें कॉनफैड के सहायक लेखाधिकारी सांवतराम, नागरिक आपूर्ति प्रबंधक राजेन्द्र और लोकेश कुमार बापना, सहायक प्रबंधक प्रतिभा सैनी, योजना प्रबंधक योगेन्द्र शर्मा, प्रबंधक राजेन्द्र सिंह शेखावत, गोदाम कीपर रामधन बैरवा और सुपरवाइजर दिनेश कुमार शर्मा शामिल हैं। इसके अलावा केन्द्रीय भण्डार के रीजनल मैनेजर शैलेश सक्सैना, डिप्टी मैनेजर बी.सी. जोशी और सहायक मैनेजर दन सिंह के नाम भी एफआईआर में दर्ज हैं।
ACB अधिकारियों का कहना है कि यह घोटाला योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया और इसमें सरकारी तंत्र के भीतर बैठे लोगों की सक्रिय भूमिका रही। जांच एजेंसी अब आरोपियों की संपत्ति, बैंक खातों और लेन-देन की गहन जांच कर रही है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।
कोविड जैसी आपदा के समय बच्चों के पोषण के नाम पर किया गया यह कथित घोटाला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का भी गंभीर उदाहरण माना जा रहा है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कितनी सख्त कार्रवाई होती है और क्या राज्य सरकार इस घोटाले से जुड़े हर जिम्मेदार व्यक्ति को कटघरे में खड़ा कर पाएगी या नहीं।


