मनीषा शर्मा । राजस्थान में जिलों के पुनर्गठन को लेकर चल रही बहस एक बार फिर सुर्खियों में है। बाड़मेर और बालोतरा जिलों की सीमाओं में हालिया बदलाव पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सरकार के आदेश को “तुगलकी फरमान” बताते हुए कहा कि यह फैसला प्रशासनिक तर्क से अधिक राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित लगता है।
निर्णय को बताया जनता के साथ अन्याय
गहलोत का आरोप है कि सरकार ने यह फैसला जनता की सुविधा को दरकिनार करके लिया। उनके अनुसार, गुड़ामालानी क्षेत्र के लोगों के लिए जिला मुख्यालय की दूरी कम होने के बजाय बढ़ गई है, जिससे आमजन को अनावश्यक परेशानी झेलनी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि जिले की सीमाएं तय करते समय मूल लक्ष्य होना चाहिए कि प्रशासन लोगों के करीब पहुंचे, न कि उनसे दूर चला जाए।
अधिसूचना के मुख्य बिंदु
31 दिसंबर को जारी अधिसूचना में बायतू उपखंड को बाड़मेर में शामिल किया गया है, जबकि गुड़ामालानी और धोरीमन्ना उपखंड अब बालोतरा जिले का हिस्सा होंगे। साथ ही बायतू उपखंड की गिड़ा और पाटोदी तहसील बालोतरा में सम्मिलित की गई हैं। संशोधित ढांचे के बाद बालोतरा जिले में 5 उपखंड, 9 तहसील और 5 उपतहसील होंगी।
पूर्व सरकार की मंशा का जिक्र
गहलोत ने याद दिलाया कि 7 अगस्त 2023 को कांग्रेस सरकार ने बालोतरा को जिला बनाते समय उद्देश्य रखा था कि “प्रशासन जनता के द्वार तक” पहुँचे। उनका कहना है कि बड़े जिलों का बोझ कम करके नागरिक सेवाओं को तेज और सुगम बनाना प्राथमिकता थी। लेकिन मौजूदा फेरबदल से उस सोच को कमजोर किया गया है और लोगों में संशय की स्थिति पैदा हो गई है।
सियासी समीकरणों का आरोप
पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया कि इस निर्णय के पीछे प्रशासनिक समीक्षा नहीं, बल्कि आगामी परिसीमन और राजनीतिक गणित का दबाव ज्यादा दिखाई देता है। उनके अनुसार, अगर सरकार ने व्यापक जनसुनवाई की होती तो कई क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतें सामने आतीं और ऐसे विवाद पैदा नहीं होते।
सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ
अधिसूचना वायरल होते ही प्रभावित क्षेत्रों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। कुछ लोगों ने इसे विकास के अवसर के रूप में देखा, जबकि कई स्थानीय संगठन दूरी बढ़ने और कार्यों में देरी को लेकर चिंतित दिखे। कई स्थानों से सरकार से पुनर्विचार की मांग भी उठने लगी है।
गहलोत की मांग—निर्णय पर पुनर्विचार
इस आदेश की कड़ी निंदा करते हुए गहलोत ने कहा कि जनभावनाओं की अनदेखी लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह इस “जनविरोधी” फैसले को वापस लेकर जनता से संवाद करे और ऐसे निर्णय तथ्यात्मक अध्ययन और स्थानीय सुझावों के आधार पर ले।


