शोभना शर्मा। राजस्थान में मायरा, जिसे कई इलाकों में भात कहा जाता है, केवल एक पारिवारिक रस्म नहीं बल्कि भावनात्मक और सामाजिक जुड़ाव की गहरी परंपरा मानी जाती है। बहन के बच्चों की शादी में ननिहाल पक्ष की ओर से दिया जाने वाला मायरा वर्षों से रिश्तों की मजबूती और सम्मान का प्रतीक रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में यह परंपरा अभूतपूर्व भव्यता और रिकॉर्डतोड़ आंकड़ों के कारण चर्चा में आ गई है। मार्च 2025 में नागौर जिले के झाड़ेली गांव में भरा गया 21 करोड़ 11 लाख रुपये का मायरा अब तक का सबसे बड़ा मायरा माना जा रहा है, जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
नागौर के झाड़ेली गांव से शुरू हुआ रिकॉर्ड
मार्च 2025 में नागौर जिले के झाड़ेली गांव में पोटलिया परिवार ने डेह निवासी जगवीर छाबा के बेटे की शादी में ऐसा मायरा भरा, जिसने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। इस मायरे की कुल अनुमानित कीमत 21 करोड़ 11 लाख रुपये बताई गई। मायरे में सोना और चांदी के आभूषण, सैकड़ों बीघा कृषि भूमि, पेट्रोल पंप, कीमती भूखंड, नकद राशि और गांव के सैकड़ों परिवारों को दिए गए चांदी के सिक्के शामिल थे। मायरा भरने के लिए निकाला गया जुलूस गाजे-बाजे, पारंपरिक वेशभूषा और राजसी ठाठ-बाट के साथ गांव से निकला। यह दृश्य किसी शाही समारोह से कम नहीं था। इस आयोजन ने न केवल नागौर बल्कि पूरे राजस्थान में मायरा परंपरा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
मेड़ता सिटी का 13.71 करोड़ का मायरा
नागौर जिले में ही मेड़ता सिटी के बेदावड़ी निवासी व्यवसायी रामलाल और तुलछाराम फरड़ोदा ने भी मायरा परंपरा में एक बड़ा उदाहरण पेश किया। उन्होंने अपनी बेटी संतोष के दो बेटों की शादी में 13 करोड़ 71 लाख रुपये का मायरा भरा। यह मायरा शेखासनी गांव में आयोजित विवाह समारोह में दिया गया, जिसकी चर्चा लंबे समय तक बनी रही। इस मायरे में नकद राशि, कीमती जमीन, सोना-चांदी के आभूषण, वाहन और अन्य महंगे उपहार शामिल थे। भव्य आयोजन और विशाल जुलूस ने इसे प्रदेश के बड़े मायरों की सूची में दूसरे स्थान पर पहुंचा दिया।
पुराने रिकॉर्ड भी हुए पीछे
इन भव्य आयोजनों से पहले नागौर जिले के ढीगसरा गांव में भरा गया 8 करोड़ रुपये का मायरा सबसे बड़ा माना जाता था। लेकिन झाड़ेली और मेड़ता सिटी के मायरों ने उस रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया। इसके अलावा बीकानेर जिले के नोखा क्षेत्र में 1 करोड़ 56 लाख रुपये और भरतपुर जिले में 1 करोड़ 21 लाख रुपये के मायरे भी हाल के समय में चर्चा में रहे। इन सभी आयोजनों की गूंज केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे प्रदेश और देश तक पहुंची। मायरे की तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हुए, जिससे यह परंपरा एक बार फिर सुर्खियों में आ गई।
मायरा परंपरा का सामाजिक महत्व
राजस्थान में मायरा या भात मूल रूप से ननिहाल पक्ष द्वारा भांजे-भांजियों को दिया जाने वाला स्नेह और आशीर्वाद माना जाता है। परंपरागत रूप से इसमें कपड़े, आभूषण और सामर्थ्य के अनुसार नकद राशि दी जाती रही है। इसका उद्देश्य रिश्तों को मजबूत करना और बेटी के ससुराल पक्ष में सम्मान बढ़ाना रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में करोड़ों के मायरे इस परंपरा के बदलते स्वरूप की ओर इशारा करते हैं। जहां एक ओर इसे आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि कहीं यह परंपरा दिखावे और प्रतिस्पर्धा का रूप तो नहीं ले रही।
परंपरा और दिखावे के बीच बहस
सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि मायरा परंपरा की मूल भावना स्नेह और सहयोग की रही है। हालांकि, जब मायरे की राशि करोड़ों में पहुंच जाती है, तो यह समाज के सामान्य वर्ग के लिए दबाव और तुलना का कारण भी बन सकती है। इसके बावजूद, इन भव्य मायरों ने राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दी है।
सुर्खियों में राजस्थान की संस्कृति
21 करोड़ के मायरे से लेकर 1 करोड़ से अधिक के अन्य आयोजनों तक, इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि राजस्थान की पारंपरिक रस्में आज भी जीवंत हैं, भले ही उनका स्वरूप बदल रहा हो। मायरा परंपरा ने एक बार फिर यह साबित किया है कि राजस्थान केवल इतिहास और किलों का प्रदेश नहीं, बल्कि जीवंत सामाजिक परंपराओं का भी गढ़ है, जो समय के साथ नए रूप में सामने आ रही हैं।


