शोभना शर्मा। राष्ट्रीय खेल पुरस्कार 2025 के लिए राजस्थान के लिए यह साल गौरवपूर्ण साबित होने जा रहा है। इस बार राज्य के तीन युवा खिलाड़ियों को प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। खेल मंत्रालय को भेजी गई सिफारिशों में जिन नामों को शामिल किया गया है, उनमें सबसे अधिक चर्चा जयपुर राजघराने के सदस्य और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पोलो खिलाड़ी पद्मनाभ सिंह को लेकर है। खेल जगत में उनकी उपलब्धियों और निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए यह सिफारिश राजस्थान के खेल इतिहास में एक अहम उपलब्धि मानी जा रही है।
पद्मनाभ सिंह केवल एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय पोलो का एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। 26 वर्षीय पद्मनाभ सिंह भारतीय पोलो टीम के कप्तान रह चुके हैं और उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में देश का प्रतिनिधित्व किया है। उनकी पहचान एक सफल पोलो खिलाड़ी के साथ-साथ वैश्विक मंच पर भारत का नाम रोशन करने वाले युवा खेल आइकन के रूप में भी है। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी उन्हें चर्चा में रखती है, क्योंकि उनकी माता दीया कुमारी राजस्थान की उप मुख्यमंत्री हैं।
पोलो खेल में उत्कृष्ट योगदान के कारण पद्मनाभ सिंह को वर्ष 2018 में फोर्ब्स 30 अंडर 30 एशिया की सूची में शामिल किया गया था। यह सम्मान उन युवाओं को दिया जाता है, जिन्होंने कम उम्र में अपने क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां हासिल की हों। इसके अलावा अमेरिकी ग्लोबल ब्रांड यूएस पोलो ने उन्हें अपना ग्लोबल ब्रांड एंबेसडर भी नियुक्त किया है। यह इस बात का संकेत है कि उनकी पहचान केवल खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि वे भारतीय युवाओं के लिए एक वैश्विक प्रतिनिधि बन चुके हैं।
पद्मनाभ सिंह का मानना है कि राजस्थान में अब पोलो खेल को लेकर माहौल तेजी से बदल रहा है। पहले यह खेल सीमित दायरे तक सिमटा हुआ माना जाता था, लेकिन अब राज्य के कई युवा पोलो की ओर आकर्षित हो रहे हैं। भारतीय पोलो टीम में राजस्थान के खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने के अवसर भी लगातार बढ़ रहे हैं। उनके अनुसार आने वाला समय भारतीय पोलो के लिए काफी सुनहरा साबित हो सकता है, बशर्ते खिलाड़ियों को सही प्रशिक्षण और मंच मिलता रहे।
एक पूर्व राजपरिवार के सदस्य होने के कारण पद्मनाभ सिंह की परवरिश शाही परिवेश में हुई। उनका जन्म 2 जुलाई 1998 को जयपुर राजपरिवार में हुआ था। उनके बचपन के शुरुआती वर्ष पारंपरिक शाही जीवनशैली के बीच गुजरे। अजमेर के प्रतिष्ठित मेयो कॉलेज में उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई, जहां से कई नामचीन खिलाड़ी और प्रशासक देश को मिल चुके हैं। स्कूली जीवन के दौरान ही उन्हें पोलो से गहरा लगाव हो गया था।
इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड का रुख किया और फिर न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से लिबरल आर्ट्स में पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के साथ-साथ पोलो उनके जीवन का अहम हिस्सा बना रहा। कॉलेज के दिनों में उन्होंने कई बड़े पोलो टूर्नामेंट में हिस्सा लिया और अपनी टीम को जीत दिलाई। इन प्रतियोगिताओं में उनके शानदार प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय पोलो टीम तक पहुंचाया।
भारतीय पोलो टीम में चयन के बाद पद्मनाभ सिंह ने अपने खेल से सभी को प्रभावित किया। उनकी नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उन्हें टीम का कप्तान भी बनाया गया। कप्तान के रूप में उन्होंने इंग्लैंड, अर्जेंटीना और अमेरिका जैसे देशों में आयोजित प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारतीय टीम का नेतृत्व किया। इन मुकाबलों में भारतीय टीम के प्रदर्शन ने अंतरराष्ट्रीय पोलो जगत में भारत की साख को मजबूत किया।
पद्मनाभ सिंह की उपलब्धियां केवल खेल तक सीमित नहीं रहीं। वे भारतीय युवाओं के लिए अनुशासन, समर्पण और संतुलन का उदाहरण बनकर उभरे हैं। शाही विरासत होने के बावजूद उन्होंने खेल के मैदान में अपनी पहचान मेहनत और प्रदर्शन के दम पर बनाई है। यह तथ्य उन्हें अन्य खिलाड़ियों से अलग बनाता है।
जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह के निधन के बाद मात्र 12 वर्ष की उम्र में ही पद्मनाभ सिंह को राजपरिवार का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था। वर्ष 2021 में उनके बालिग होने के बाद उन्हें औपचारिक रूप से ‘जयपुर के शासक’ के रूप में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ ताज पहनाया गया। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजाओं का शासन नहीं रहा, फिर भी पूर्व राजपरिवारों में यह परंपरा सांस्कृतिक रूप से निभाई जाती है।
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार 2025 के लिए अर्जुन पुरस्कार की सिफारिश पद्मनाभ सिंह के खेल जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। यदि उन्हें यह सम्मान मिलता है, तो यह न केवल उनके व्यक्तिगत करियर के लिए, बल्कि राजस्थान और भारतीय पोलो के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि होगी। यह सम्मान उन युवा खिलाड़ियों को भी प्रेरित करेगा, जो पारंपरिक और कम चर्चित खेलों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।


