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अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद अधिवेशन: सामाजिक समरसता और वकीलों की सुरक्षा पर जोर

अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद अधिवेशन: सामाजिक समरसता और वकीलों की सुरक्षा पर जोर

मनीषा शर्मा।  अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद का 17वां राष्ट्रीय अधिवेशन बालोतरा-नाकोड़ा स्थित लालबाग परिसर में भव्य रूप से आरंभ हुआ। तीन दिनों तक चलने वाले इस अधिवेशन में देशभर से आए वरिष्ठ न्यायाधीशों, सॉलिसिटर जनरल, केंद्रीय कानून मंत्री, अधिवक्ताओं और विभिन्न हाईकोर्टों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उद्घाटन सत्र में न्यायपालिका और समाज के बीच समरसता, संविधान के प्रति जिम्मेदारी, वकीलों की सुरक्षा, मेडिकल सुविधाओं और अप्रासंगिक कानूनों को हटाने जैसे मुद्दे प्रमुखता से सामने आए।

उद्घाटन कार्यक्रम मां भारती, अधिवक्ता परिषद के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ शुरू हुआ। सत्र का विषय था — “भारतीय संविधान के 75 वर्ष: सामाजिक समरसता” — जिसे सभी वक्ताओं ने अपने-अपने दृष्टिकोण से विस्तार दिया।

जाति-भाषा आधारित राष्ट्र की अवधारणा घातक: जस्टिस विजय बिश्नोई

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विजय बिश्नोई ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र तभी सफल होता है जब उसमें लिबर्टी, इक्वालिटी और फ्रैटरनिटी तीनों साथ-साथ स्थापित हों। उन्होंने डॉ. अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक समरसता केवल नारे से नहीं, बल्कि व्यवहार में लागू करने से संभव होती है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जाति और भाषा के आधार पर राष्ट्र की अवधारणा घातक है। यह सोच कि किसी राज्य में केवल उसकी भाषा-भाषी ही रह सकते हैं, देश की एकता को कमजोर करती है। भारत विविधताओं का देश है और इस विविधता को संरक्षित करते हुए आगे बढ़ना ही असली राष्ट्रधर्म है। जस्टिस बिश्नोई ने अधिवक्ताओं से आह्वान किया कि वे समाज में संवाद और न्याय के प्रहरी बनकर साझा समस्याओं के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाएं।

मेडिकल पॉलिसी और एडवोकेट्स प्रोटेक्शन एक्ट पर आश्वासन

केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने अधिवक्ताओं को लेकर कई अहम घोषणाएं कीं। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार अब तक 1562 अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त कर चुकी है और हाल ही में 71 और कानूनों को निरस्त किया गया है, जिनकी वर्तमान समय में आवश्यकता नहीं थी। यह कदम न्याय प्रणाली को सरल और आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। मेघवाल ने कहा कि सरकार वकीलों के लिए मेडिकल पॉलिसी लागू करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि एडवोकेट्स प्रोटेक्शन एक्ट, जो वर्तमान में लॉ कमीशन के पास विचाराधीन है, उसे जल्द आगे बढ़ाया जाएगा ताकि अधिवक्ताओं की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित हो सके।

संविधान का प्रहरी हैं वकील: जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी

राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने कहा कि भारत में हर 20 किलोमीटर पर बोली, पहनावा और परंपरा बदल जाती है। ऐसी स्थिति में संविधान निर्माताओं के सामने विशाल चुनौती थी, लेकिन उन्होंने ऐसा संविधान दिया जिसमें हर वर्ग के अधिकार सुरक्षित हैं। उन्होंने अधिवक्ताओं को “संविधान का प्रहरी” बताते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक समरसता तभी स्थापित होगी जब कानून और व्यवस्था के साथ-साथ समाज में न्याय की भावना बराबरी से पहुंचे।

संवैधानिक अधिकारों के साथ कर्तव्यों का पालन भी जरूरी

भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अधिवेशन को संबोधित करते हुए कहा कि सामाजिक समरसता केवल भाषणों से नहीं आएगी — इसके लिए धरातल पर कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि हम न्यायालयों से राहत चाहते हैं, तो हमें अपने संवैधानिक कर्तव्यों का भी ईमानदारी से पालन करना होगा। उन्होंने अधिवक्ता परिषद द्वारा शहीदी दिवस पर सम्मेलन आयोजित किए जाने को विशेष महत्व देते हुए कहा कि यह न्याय और कर्तव्य के संतुलन का संदेश देता है।

व्यापक भागीदारी और सांस्कृतिक सरोकार

अधिवेशन में परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. श्रीनिवास मूर्ति ने अध्यक्षीय भाषण में संगठन की दृष्टि और कार्ययोजना पर प्रकाश डाला। महासचिव डी. भरत कुमार ने परिषद की गतिविधियों पर रिपोर्ट प्रस्तुत की। विभिन्न प्रांतों से आए पदाधिकारियों और अतिथियों ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में राज्य के महाधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट और देशभर के अनेक हाईकोर्टों के न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता और बड़ी संख्या में प्रतिनिधि मौजूद रहे। अंत में प्रांत अध्यक्ष सुनील जोशी ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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