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राजस्थान की हवेलियों को यूनेस्को सूची में लाने की तैयारी, दिया कुमारी का बड़ा बयान

राजस्थान की हवेलियों को यूनेस्को सूची में लाने की तैयारी, दिया कुमारी का बड़ा बयान

शोभना शर्मा।  राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में राज्य सरकार एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने स्पष्ट किया है कि राजस्थान सरकार प्रदेश की ऐतिहासिक हवेलियों के संरक्षण को लेकर संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को से संपर्क करने जा रही है। सरकार की योजना राजस्थान की चुनिंदा हवेलियों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की है, ताकि इन धरोहरों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण और पहचान मिल सके।

झुंझुनूं जिले के मंडावा कैसल में आयोजित विशेष कार्यक्रम ‘राइजिंग राजस्थान: विकास भी, विरासत भी’ के दौरान दिया कुमारी ने कहा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में प्रदेश सरकार विकास के साथ-साथ विरासत के संरक्षण को भी समान रूप से महत्व दे रही है। उन्होंने कहा कि राजस्थान केवल किलों और महलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक हवेलियों के लिए भी विश्वभर में जाना जाता है।

600 से ज्यादा हवेलियों की पहचान

उपमुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि राज्य सरकार ने अब तक 600 से अधिक ऐतिहासिक हवेलियों की पहचान की है। इनमें शेखावाटी अंचल, मारवाड़, मेवाड़ और हाड़ौती क्षेत्र की कई ऐसी हवेलियां शामिल हैं, जो अपनी स्थापत्य कला, भित्ति चित्रों और ऐतिहासिक महत्व के लिए जानी जाती हैं। सरकार ने ऐसे क्षेत्रों को भी चिह्नित किया है, जहां बड़ी संख्या में विरासत संरचनाएं मौजूद हैं।

दिया कुमारी ने कहा कि इन सभी जानकारियों और दस्तावेजों के साथ राज्य सरकार यूनेस्को के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करेगी। उनका मानना है कि यूनेस्को भी इस बात को समझेगा कि राजस्थान की हवेलियों का संरक्षण न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया की सांस्कृतिक विरासत के लिए जरूरी है।

राजस्थान पहले से यूनेस्को में अग्रणी

उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में राजस्थान में नौ इमारतें पहले से ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं, जो देश में सबसे अधिक हैं। इनमें आमेर किला, जंतर-मंतर, केवला देव राष्ट्रीय उद्यान और राजस्थान के ऐतिहासिक पहाड़ी किले शामिल हैं। अब सरकार की कोशिश है कि हवेलियों को भी इस सूची में शामिल कराकर राजस्थान की विरासत को और व्यापक पहचान दिलाई जाए।

निजी संपत्ति होने से सीमित भूमिका

दिया कुमारी ने यह भी स्वीकार किया कि हवेलियों के संरक्षण में सरकार की भूमिका कई बार सीमित हो जाती है, क्योंकि इनमें से अधिकांश हवेलियां निजी स्वामित्व में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार किसी निजी संपत्ति पर जबरन संरक्षण के नियम लागू नहीं कर सकती। हालांकि, सरकार यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था हवेलियों के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ न करे।

उन्होंने बताया कि प्रशासनिक स्तर पर यह व्यवस्था की जा रही है कि यदि कोई व्यक्ति हवेली के ऐतिहासिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने वाला निर्माण या बदलाव करता है, तो उसे रोका जाए। इसके साथ ही लोगों में जागरूकता भी बढ़ाई जा रही है, ताकि वे अपनी विरासत को सहेजने के महत्व को समझ सकें।

हवेलियों के बेहतर उपयोग पर जोर

उपमुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल हवेलियों को संरक्षित करना ही नहीं, बल्कि उनका बेहतर और टिकाऊ उपयोग भी सुनिश्चित करना है। यदि संभव हो, तो इन हवेलियों को होम-स्टे, हेरिटेज होटल, संग्रहालय, कला-संस्कृति केंद्र या पर्यटन गतिविधियों से जोड़ा जा सकता है। इससे न केवल हवेलियों का रखरखाव बेहतर होगा, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार और आय के नए अवसर भी मिलेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि हवेलियों को बेचने पर कोई कानूनी रोक नहीं है, लेकिन उनके मूल स्वरूप को बिगाड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सरकार चाहती है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन बना रहे।

विकास भी, विरासत भी का संदेश

दिया कुमारी ने कहा कि राजस्थान की पहचान उसकी विरासत से जुड़ी हुई है। यदि इस विरासत को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास से कट जाएंगी। इसलिए राज्य सरकार का प्रयास है कि आधुनिक विकास के साथ-साथ ऐतिहासिक धरोहरों को भी सुरक्षित रखा जाए।

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