मनीषा शर्मा। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने उदयपुर मास्टर प्लान-2031 से जुड़े एक अहम मामले में राज्य सरकार और उदयपुर विकास प्राधिकरण को स्पष्ट निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने लैंड यूज मैप में हुई ‘ड्राफ्टिंग एरर’ को स्वीकार करते हुए उसे सुधारने का आदेश दिया है। जस्टिस सुनील बेनीवाल ने 17 दिसंबर को दो जुड़े हुए मामलों पर रिपोर्टेबल जजमेंट सुनाते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की जमीन को ग्रीन जोन-1 (G-1) से हटाकर ग्रीन जोन-2 (G-2) में शामिल किया जाए। कोर्ट ने राज्य सरकार को एक महीने के भीतर मास्टर प्लान-2031 के मैप और संबंधित जोनल डेवलपमेंट प्लान में आवश्यक संशोधन करने के निर्देश दिए हैं।
फतहसागर झील की दूरी बनी विवाद की जड़
मामले की मूल वजह फतहसागर झील के फुल टैंक लेवल यानी FTL से दूरी को लेकर थी। कोर्ट ने माना कि जिन जमीनों को G-1 जोन में दर्शाया गया है, वे झील के FTL से 100 मीटर से अधिक दूरी पर स्थित हैं। मास्टर प्लान-2031 के प्रावधानों के अनुसार केवल FTL से 100 मीटर तक का क्षेत्र ही ग्रीन जोन-1 में आता है, जबकि इससे अधिक दूरी वाला क्षेत्र ग्रीन जोन-2 की श्रेणी में रखा जाता है।
कोर्ट के अनुसार, लैंड यूज मैप में तकनीकी गलती के चलते इन जमीनों को गलत तरीके से G-1 जोन में दर्शा दिया गया, जिससे याचिकाकर्ताओं के भूमि उपयोग और निर्माण से जुड़े अधिकार प्रभावित हो रहे थे।
याचिकाकर्ताओं की जमीन और उनकी मांग
यह याचिका पीयूष मारू, चिराग मारू, मोनिका और सोनाली द्वारा दायर की गई थी। इनकी उदयपुर जिले की गिरवा तहसील के गांव सिसारमा में खसरा नंबर 1697 में 0.8600 हेक्टेयर कृषि भूमि है। याचिकाकर्ता अपनी जमीन पर होटल या रिसॉर्ट विकसित करना चाहते थे, लेकिन मास्टर प्लान-2031 के लैंड कन्वर्जन मैप में जमीन को ग्रीन जोन-1 दिखाए जाने के कारण उन्हें भूमि रूपांतरण की अनुमति नहीं मिल पा रही थी।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में तर्क दिया कि उनकी जमीन फतहसागर झील से लगभग 129 से 150 मीटर की दूरी पर है। जमीन और झील के बीच सड़क और राजीव गांधी पार्क भी स्थित है, ऐसे में इसे G-1 जोन में शामिल करना मास्टर प्लान के नियमों के खिलाफ है।
अधिकारियों की रिपोर्ट ने मानी गलती
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि खुद यूआईटी, जिसे अब उदयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी कहा जाता है, ने पहले ही ड्राफ्टिंग एरर को स्वीकार कर लिया था। याचिकाकर्ताओं ने 8 अप्रैल 2019 को एक रिप्रेजेंटेशन दिया था, जिस पर 19 जून 2019 को UIT ने अपनी रिपोर्ट में माना कि राजीव गांधी पार्क के आसपास की जमीन को गलती से G-1 जोन में दिखाया गया है।
इसके बाद 9 दिसंबर 2021 की रिपोर्ट में भी UIT ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं की जमीन फतहसागर झील के FTL से 100 मीटर से अधिक दूरी पर स्थित है और इसे ग्रीन जोन-2 में होना चाहिए।
राज्य सरकार के निर्देश और बाद का यू-टर्न
राज्य सरकार ने 11 जनवरी 2022 को UIT को निर्देश दिए थे कि यदि मास्टर प्लान की रिपोर्ट और भू-उपयोग मानचित्र में विरोधाभास है, तो इसे जोनल डेवलपमेंट प्लान में ठीक कर न्यास बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव पारित कर सरकार को भेजा जाए।
इसके तहत 29 सितंबर 2022 को सार्वजनिक नोटिस जारी किया गया और याचिकाकर्ताओं ने 30 सितंबर को आपत्ति दर्ज कराई। 28 अक्टूबर 2022 को हुई बैठक में UIT ने माना कि जमीन FTL से 100 मीटर से अधिक दूर है और इसे G-1 से हटाने की सिफारिश की।
हालांकि, बाद में UIT और राज्य सरकार अपने ही रुख से पीछे हटते नजर आए और कोर्ट के पहले आदेश को वापस लेने की अर्जी दायर कर दी, जिस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई।
सरकार की दलीलें कोर्ट ने की खारिज
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश पंवार ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने 2018 में जमीन खरीदी थी और उन्हें इसकी स्थिति की जानकारी थी। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पुराने मामलों का हवाला देते हुए 200 मीटर तक नो-कंस्ट्रक्शन जोन का तर्क दिया।
कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि यहां मास्टर प्लान में किसी तरह का बदलाव नहीं मांगा जा रहा है, बल्कि पहले से तय परिभाषा के अनुसार मैप में हुई तकनीकी गलती को ठीक करने की मांग है।
कोर्ट का स्पष्ट आदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि निजी हित को सार्वजनिक हित से ऊपर नहीं रखा जा सकता, लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ता केवल ड्राफ्टिंग एरर के सुधार की मांग कर रहे हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार एक महीने के भीतर मास्टर प्लान-2031 और जोनल डेवलपमेंट प्लान में आवश्यक संशोधन करे।
दूसरे मामले में गोविंद अग्रवाल की जमीन को लेकर उदयपुर विकास प्राधिकरण को एक महीने में मौका मुआयना कर दूरी मापने और रिपोर्ट सरकार को भेजने के आदेश दिए गए हैं। यदि जमीन FTL से 100 मीटर के बाहर पाई जाती है, तो उसमें भी उसी तरह सुधार किया जाएगा।


