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राजस्थान में डेड बॉडी रोककर विरोध करने पर 5 साल तक जेल

राजस्थान में डेड बॉडी रोककर विरोध करने पर 5 साल तक जेल

शोभना शर्मा। राजस्थान में अब डेड बॉडी का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन या राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी। राज्य सरकार ने ‘राजस्थान मृतक शरीर के सम्मान अधिनियम’ के नियम अधिसूचित कर दिए हैं। इन नियमों के लागू होने के बाद अस्पतालों से शव लेकर विरोध प्रदर्शन करना, अंतिम संस्कार में जानबूझकर देरी करना या डेड बॉडी रखकर राजनीतिक दवाब बनाने पर 1 से 5 साल तक की जेल और जुर्माना का प्रावधान लागू हो गया है। यह कानून परिवारजनों से लेकर नेताओं तक सभी को दायरे में लाएगा।

यह अधिनियम पहले ही 18 अगस्त 2023 से प्रभावी हो गया था, लेकिन नियम न बनने की वजह से पुलिस और प्रशासन कार्रवाई की स्थिति में नहीं थे। अब नियम बन जाने के बाद इसके प्रावधानों के तहत दंडात्मक कार्रवाई करना आसान हो जाएगा। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार राजस्थान में कई बार सड़क पर बैठकर या अस्पताल के सामने शव रखकर धरने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे मामलों में अक्सर पुलिस और प्रशासन समझाइश में कई-कई दिन लगा देते थे, जिससे आम जनजीवन प्रभावित होता था। अब ऐसे हालात में सीधी कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी।

24 घंटे में अंतिम संस्कार अनिवार्य

नए नियमों के अनुसार मृतक के परिजनों को 24 घंटे के भीतर अंतिम संस्कार करना अनिवार्य होगा। यदि किसी परिस्थिति में देरी आवश्यक हो, तो केवल दो कारण मान्य होंगे — पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया चल रही हो या किसी करीबी रिश्तेदार के आने का इंतजार हो। यदि कोई व्यक्ति या परिवार जानबूझकर अंतिम संस्कार टालता है तो पुलिस डेड बॉडी को कब्जे में लेकर अंतिम संस्कार करवा सकेगी।

सजा के प्रावधान

कानून में अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर सजा निर्धारित की गई है—

  1. डेड बॉडी लेने से इंकार करने पर – 1 साल तक की सज़ा

  2. परिवार द्वारा विरोध प्रदर्शन के लिए शव का इस्तेमाल या अनुमति देने पर – 2 साल तक की सज़ा

  3. नेता या गैर-परिजन द्वारा शव के साथ प्रदर्शन या राजनीति करने पर – 5 साल तक की सज़ा

इसके अलावा अस्पताल भी डेड बॉडी को जबरन रोके नहीं रख सकेंगे। यदि परिजन शव वापस लेने के लिए तैयार हों तो अस्पताल देरी नहीं कर पाएंगे।

लावारिस शवों के लिए सख्त व्यवस्थाएं

कानून का एक बड़ा हिस्सा लावारिस शवों की गरिमा और गोपनीयता से जुड़ा है। लावारिस शवों की पहचान और रिकॉर्ड के लिए राज्य सरकार डिजिटल डेटा बैंक बनाएगी जिसमें जेनेटिक प्रोफाइल, बायोलॉजिकल सैंपल और अन्य विवरण संग्रहित किए जाएंगे। इस तरह की सूचना पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी और अनावश्यक रूप से किसी को उपलब्ध नहीं कराई जाएगी।

अधिनियम के तहत लावारिस शवों की पोस्टमॉर्टम वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी अनिवार्य होगी। महिला और पुरुष शवों को अलग-अलग रखने का स्पष्ट प्रावधान भी लागू किया गया है। शवों को डीप फ्रीजर या मॉर्च्युरी में अनुशासन, स्वच्छता और सम्मान के साथ सुरक्षित रखना अनिवार्य किया गया है।

गोपनीयता भंग करने पर कड़ा दंड निर्धारित है — ऐसे मामलों में कम से कम 3 साल और अधिकतम 10 साल तक की सज़ा तथा जुर्माना का प्रावधान है।

राजनीतिक विवाद भी जुड़ा रहा

इस कानून को विधानसभा में पारित किए जाने के दौरान भारी विवाद हुआ था। जुलाई 2023 में जब बिल सदन में आया, तब विपक्ष ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए आपातकाल जैसी मानसिकता वाला बताया था। तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने कहा था कि परिजन किसी अपने की मौत के बाद तभी विरोध करते हैं जब उनके साथ बड़ा अन्याय हुआ हो। उन्होंने इस बिल को जनता की आवाज दबाने वाला बताया था।

राजनीतिक विरोध के बावजूद बिल पारित हुआ और अब वर्तमान सरकार ने बिना किसी बदलाव के इसके नियम लागू कर दिए हैं। ऐसे में यह राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बन गया है कि जिसे एक समय बीजेपी ने आपातकाल की याद दिलाने वाला बताया था, उसी पर अब उसकी सरकार ने मुहर लगा दी है।

नतीजों पर नजर रहेगी

नियम लागू होने के बाद प्रदेश में यह देखने वाली बात होगी कि क्या अस्पतालों, पुलिस और परिजनों के बीच डेड बॉडी से जुड़े विवाद वास्तव में कम होते हैं या नहीं। प्रशासनिक व्यवस्था को नई जिम्मेदारियों के साथ अपने व्यवहार और सिस्टम में बदलाव भी लाना होगा। सरकार का दावा है कि यह कानून मृतकों के सम्मान और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है, हालांकि विरोध करने वालों का मानना है कि इससे विरोध प्रदर्शनों के अधिकार सीमित होंगे।

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