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अरावली में खनन जारी, सुप्रीम कोर्ट की रोक बेअसर; सरिस्का टाइगर रिजर्व पर बढ़ा खतरा

अरावली में खनन जारी, सुप्रीम कोर्ट की रोक बेअसर; सरिस्का टाइगर रिजर्व पर बढ़ा खतरा

मनीषा शर्मा। राजस्थान की अरावली पर्वतमाला, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है, आज गंभीर पर्यावरणीय संकट के दौर से गुजर रही है। दिल्ली से गुजरात तक फैली यह श्रृंखला उत्तर भारत के मौसम, भूजल, जैव-विविधता और वन्यजीव संरक्षण की रीढ़ मानी जाती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अरावली में अवैध खनन और अतिक्रमण का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव अलवर जिले के सरिस्का टाइगर रिजर्व सहित पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है।

जांच में सामने आए चौंकाने वाले खुलासे

एक खोजी टीम ने हाल ही में अरावली क्षेत्र का निरीक्षण किया, जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान सरिस्का और उसके आसपास के इलाकों में सामने आया। सरिस्का केवल एक संरक्षित क्षेत्र नहीं बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का स्थल भी है—मान्यताओं के अनुसार यहां सप्तऋषियों ने तपस्या की थी, पांडवों ने वनवास बिताया था और भर्तृहरि की तपोभूमि भी यहीं स्थित है। उपग्रह चित्रों में यह क्षेत्र ॐ के आकार की तरह प्रतीत होता है, जो इसकी विशिष्ट भौगोलिक संरचना का संकेत है।

साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि अरावली के एक किलोमीटर दायरे में किसी भी प्रकार का खनन पूरी तरह प्रतिबंधित होगा। 2024 में सरकार ने कोर्ट को बताया कि इस दायरे में 110 खदानें मौजूद थीं, जिनमें से 68 सक्रिय रूप से चल रही थीं। सरकार का दावा है कि इनमें से सभी खनन गतिविधियां बंद कर दी गई हैं। लेकिन जांच टीम जब सरिस्का, टहला और अलवर के आसपास पहुंची, तो हकीकत इसके बिल्कुल उलट निकली।

कई खदानें सतह पर तो बंद दिखीं, लेकिन उनके अंदर मशीनें साफ-साफ खड़ी दिखाई दीं। कुछ स्थानों पर खनन के ताज़ा निशान मिले। स्थानीय लोगों ने बताया कि रात के समय चोरी-छिपे खनन जारी है। जांच टीम के पहुंचते ही कुछ संदिग्ध लोग उन्हें रोकने आए और उनकी गाड़ी का पीछा भी किया।

नए नियमों ने बढ़ाई पर्यावरणविदों की चिंता

इस बीच पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत एक नया ड्राफ्ट भी विवादों में है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए इस मसौदे के अनुसार अब केवल 100 मीटर ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली का संरक्षित हिस्सा माना जाएगा। इससे 2010 में Forest Survey of India (FSI) द्वारा तय मानकों में बड़ा बदलाव हो जाएगा, जिसमें 3° ढलान, 115 मीटर ऊंचाई और 100 मीटर का बफर जोन शामिल था।

अक्टूबर 2024 में भी एफएसआई ने एक नया सुझाव दिया था जिसमें 30 मीटर ऊंचाई और 4.57° ढलान को संरक्षण का आधार बनाने का प्रस्ताव था। इस प्रस्ताव में पर्यावरणविदों ने पहले ही गहरी आपत्ति जताई थी। अब मंत्रालय के 100 मीटर मानक ने चिंता और बढ़ा दी है।

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के 15 जिलों में अरावली की 12081 पहाड़ियां 20 मीटर से ज्यादा ऊंची हैं। इनमें—

  • 1048 पहाड़ियां ही 100 मीटर से अधिक हैं (सिर्फ 8.7%)

  • 1594 पहाड़ियां 80 मीटर

  • 2656 पहाड़ियां 60 मीटर

  • 5009 पहाड़ियां 40 मीटर

  • और 107494 पहाड़ियां 20 मीटर तक की

इसका सीधा मतलब है कि 100 मीटर वाले नियम लागू होते ही लगभग 90% अरावली संरक्षित क्षेत्र के दायरे से बाहर हो जाएगा, जिससे खनन और निर्माण कार्य के लिए खुला रास्ता मिल जाएगा।

पर्यावरणविदों की कड़ी चेतावनी

पर्यावरण विशेषज्ञ एल.के. शर्मा ने कहा कि मंत्रालय की नई परिभाषा न केवल वैज्ञानिक आधार से दूर है, बल्कि अरावली की सुरक्षा को ख़तरे में डालती है। उनके अनुसार—

  1. ऊंचाई को समुद्र तल से नहीं बल्कि जमीन के स्तर से मापना वैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण है।

  2. 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को संरक्षण से बाहर करने से अवैध खनन बढ़ेगा।

  3. अरावली का लगभग पूरा भू-भाग विनाश की ओर बढ़ जाएगा, जिसका सीधा नुकसान भूजल, वनस्पतियों और वन्यजीवों को होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरिस्का टाइगर रिजर्व के अस्तित्व पर भी गंभीर खतरा मंडरा सकता है क्योंकि यह पूरा क्षेत्र अरावली की पहाड़ियों पर निर्भर है।

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