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उदयपुर पेयजल समाधान: देवास-तृतीय और चतुर्थ जलापूर्ति परियोजनाओं को स्टेज-1 स्वीकृति

उदयपुर पेयजल समाधान: देवास-तृतीय और चतुर्थ जलापूर्ति परियोजनाओं को स्टेज-1 स्वीकृति

शोभना शर्मा।  उदयपुर शहर के भविष्य में संभावित पेयजल संकट को दूर करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने देवास-तृतीय और देवास-चतुर्थ जलापूर्ति परियोजनाओं को स्टेज-1 स्वीकृति प्रदान कर दी है। यह स्वीकृति उदयपुर में लंबे समय से चल रही जल कमी की समस्या को स्थायी समाधान देने की दिशा में निर्णायक कदम मानी जा रही है। इस प्रोजेक्ट को प्राथमिकता दिलाने में पंजाब के राज्यपाल और उदयपुर के वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया की सक्रिय भूमिका रही है, जिन्होंने इसे प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाते हुए लगातार मॉनिटरिंग की। उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कई दौर की बैठकें कर वर्षों से लंबित वन स्वीकृति की प्रक्रिया को तेज कराया।

जल संसाधन विभाग उदयपुर के अधीक्षण अभियंता मनोज जैन ने बताया कि देवास-तृतीय परियोजना के तहत गोगुंदा तहसील के नाथियाथल गांव के पास 703 एमसीएफटी क्षमता का बांध बनाया जाएगा। बांध से जल को 10.50 किलोमीटर लंबी सुरंग के माध्यम से देवास-द्वितीय (आकोड़दा बांध) तक पहुंचाया जाएगा। इसके बाद मौजूदा जल वितरण प्रणाली के माध्यम से पानी पिछोला झील में प्रवाहित होगा। इस प्रणाली के साथ जल को शहर के पेयजल नेटवर्क में पहुंचाने की संपूर्ण व्यवस्था पहले से मौजूद है, जिससे परियोजना के शुरू होते ही इसके प्रभाव दिखाई देने लगेंगे।

देवास-चतुर्थ परियोजना देवास-तृतीय से जुड़ी होगी। इसके अंतर्गत अम्बा गांव के पास 390 एमसीएफटी क्षमता का बांध निर्माण प्रस्तावित है। इस बांध से जल को 4.15 किलोमीटर लंबी सुरंग के जरिए देवास-तृतीय से जोड़ा जाएगा। दोनों परियोजनाओं के एकीकृत संचालन के बाद उदयपुर के जल स्रोतों को वर्ष भर स्थिर जल आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी। वर्तमान में गर्मी के मौसम में शहर को पेयजल की कमी से जूझना पड़ता है और कई बार झीलों का जलस्तर भी चिंताजनक स्तर तक गिर जाता है। नई परियोजनाएं इस समस्या को स्थायी रूप से दूर करने की क्षमता रखती हैं।

इन दोनों परियोजनाओं के पूर्ण होने से उदयपुर शहर को आने वाले कई दशकों तक निर्बाध पेयजल उपलब्ध होगा। साथ ही पिछोला, फतहसागर, स्वरूपसागर सहित शहर की अन्य ऐतिहासिक झीलों का जल स्तर स्थायी रूप से बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। शहर की झीलें उदयपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का केंद्र रही हैं और जल स्तर के गिरने से पर्यावरणीय असंतुलन के साथ पर्यटन पर भी प्रभाव पड़ता है। स्थिर जलस्तर केवल प्राकृतिक संतुलन को ही नहीं बल्कि पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत आधार देगा। उदयपुर की झीलें वैश्विक स्तर पर आकर्षण का केंद्र हैं और जल संरक्षण से पर्यटन गतिविधियों को बड़ा समर्थन मिलेगा।

स्टेज-1 स्वीकृति मिलने पर पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि उदयपुर की झीलें केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर हैं और उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। उनके अनुसार देवास-तृतीय और देवास-चतुर्थ जलापूर्ति परियोजनाएं उदयपुर के लिए पेयजल संकट का स्थायी समाधान सिद्ध होंगी और आने वाली पीढ़ियों को जल की कमी से जूझना नहीं पड़ेगा। कटारिया ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने में सहयोग देने के लिए केंद्र सरकार और संबंधित विभागों का आभार भी जताया।

अधीक्षण अभियंता मनोज जैन ने बताया कि अब परियोजना की फाइल स्टेज-2 स्वीकृति की ओर बढ़ेगी जो अंतिम स्वीकृति होती है। स्टेज-1 के तहत तय की गई क्षतिपूर्ति राशि जमा कराने के बाद स्टेज-2 की औपचारिक मंजूरी मिल जाएगी। उसके बाद भूमि अधिग्रहण, निर्माण कार्य, जल निकासी प्रणाली और सुरंग निर्माण जैसे तकनीकी कार्य प्रारंभ होंगे।

परियोजना के तेज क्रियान्वयन के बाद उदयपुर के हजारों परिवारों को नियमित, स्वच्छ और पर्याप्त पेयजल प्राप्त होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य की जल नीति के अनुरूप है और तेजी से बढ़ रही आबादी वाले शहर के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी। सरकारी एजेंसियों का लक्ष्य है कि स्वीकृतियां और तकनीकी प्रक्रियाएं तय समय सीमा में पूरी कर परियोजना को जल्द क्रियान्वित चरण में लाया जाए।

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