मनीषा शर्मा। अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की विश्वप्रसिद्ध दरगाह में जियारत प्रक्रिया को लेकर बड़ा प्रशासनिक बदलाव शुरू हो गया है। दरगाह में अब केवल लाइसेंसधारी खादिम ही जायरीन को जियारत करा सकेंगे। यह प्रक्रिया 75 वर्षों में पहली बार लागू की जा रही है, जिसे केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों के आधार पर शुरू किया गया है। दरगाह नाजिम मोहम्मद बिलाल खान ने सोमवार को विज्ञापन जारी करते हुए इस नई व्यवस्था की औपचारिक घोषणा की। इसके लिए लाइसेंस आवेदन 5 जनवरी 2026 तक स्वीकार किए जाएंगे।
नई प्रक्रिया क्यों लागू की जा रही है
दरगाह नाजिम ने बताया कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, केंद्र एवं राज्य सरकारों के निर्णय, जिला प्रशासन की रिपोर्ट और दरगाह सुरक्षा ऑडिट की सिफारिशों के अनुरूप उठाया गया है। दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम 1955 की धारा 11(एफ) के अंतर्गत खादिम समुदाय के अधिकार, कर्तव्य और जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इसी प्रावधान के आधार पर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि जियारत से जुड़े कार्य केवल अधिकृत और सत्यापित खादिम ही करें, ताकि जायरीन की सुविधा, सुरक्षा और पारदर्शिता बनी रहे।
लाइसेंस प्रक्रिया सिर्फ सैयद जादगान एवं शेख जादगान समुदाय के खादिमों के लिए लागू है, जो पारंपरिक रूप से दरगाह सेवा से जुड़े हुए हैं। उद्देश्य यह भी है कि खादिम समुदाय की पहचान, जिम्मेदारियों और अधिकारों को आधिकारिक रूप से दर्ज किया जा सके।
आवेदन प्रक्रिया और शर्तें
आवेदन-पत्र, नियम और शर्तें दरगाह कमेटी की आधिकारिक वेबसाइट से डाउनलोड की जा सकती हैं। इच्छुक खादिम कार्यालय नाजिम से भी फॉर्म प्राप्त कर सकते हैं। पूर्ण रूप से भरे हुए आवेदन–पत्र, आवश्यक दस्तावेज और स्वप्रमाणित प्रतियां निर्धारित अंतिम तिथि यानी 5 जनवरी 2026 तक जमा करानी होंगी।
दरगाह कमेटी का कहना है कि यह प्रक्रिया लंबे समय से आवश्यक मानी जा रही थी, लेकिन पहले कभी इसे अमल में नहीं लाया जा सका। अब लाइसेंस मिलने के बाद खादिमों को अधिकृत पहचान मिलेगी और उन्हें जियारत कार्यों के लिए प्रमाणित रूप से मान्यता प्राप्त होगी।
75 वर्षों बाद हो रहा ऐतिहासिक बदलाव
दरगाह कमेटी की स्थापना के बाद से अब तक 3 प्रशासक और 37 नाजिम अपने कार्यकाल पूरे कर चुके हैं, लेकिन खादिमों को लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया पहले कभी लागू नहीं हो पाई। सबसे पहले एडमिनिस्ट्रेटर अब्दुल रऊफ सिद्दीकी वर्ष 1954 में नियुक्त हुए थे। उनके बाद अनीस मुज्तबा जुबैरी और आले मोहम्मद शाह ने एडमिनिस्ट्रेटर का कार्यभार संभाला। बाद में एडमिनिस्ट्रेटर का पद समाप्त कर नाजिम का पद सृजित किया गया।
1 मार्च 1956 को आले मोहम्मद शाह पहले नाजिम बने। इसके बाद से मार्च 2025 तक कुल 37 नाजिम दरगाह के प्रशासनिक कार्य में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। बावजूद इसके, खादिम लाइसेंस प्रणाली लागू नहीं हो सकी थी। अब वर्तमान नाजिम मोहम्मद बिलाल खान के कार्यकाल में यह ऐतिहासिक पहल शुरू हो पाई है।
दरगाह कमेटी के अब तक 28 सदर भी अपने कार्यकाल पूरा करके जा चुके हैं। खादिमों को लाइसेंस देने संबंधी नियम पहले भी निर्धारित किए गए थे, लेकिन उन्हें व्यावहारिक रूप से लागू नहीं किया जा सका था।
बैठकें असफल, खादिमों की अनुपस्थिति रही चिंता का विषय
लाइसेंस प्रक्रिया शुरू करने से पहले नाजिम द्वारा दो बार खादिम समुदाय के साथ बैठक बुलाई गई थी। पहली बैठक 24 नवंबर और दूसरी 27 नवंबर को निर्धारित की गई, लेकिन दोनों ही बैठकों में एक भी खादिम उपस्थित नहीं हुआ। दूसरी ओर, खादिम मोहल्ला में अलग से बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता अंजुमन सदर ने की। इससे यह स्पष्ट होता है कि खादिम समुदाय इस मुद्दे पर आंतरिक चर्चा कर रहा है, लेकिन प्रशासनिक बैठकों में उनकी अनुपस्थिति कई सवाल भी खड़े करती है।


