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बाड़मेर में जांगिड़ समाज का ऐतिहासिक फैसला: शादियों में फिजूलखर्ची पर रोक

बाड़मेर में जांगिड़ समाज का ऐतिहासिक फैसला: शादियों में फिजूलखर्ची पर रोक

शोभना शर्मा।  देशभर में शादियों के खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। लाखों और करोड़ों रुपये तो आम बात हो गई है, जबकि छोटे और मध्यम वर्ग के लोग भी सामाजिक दबाव और दिखावे की प्रतिस्पर्धा में अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने के लिए विवश हो रहे हैं। ऐसे दौर में राजस्थान के बाड़मेर जिले से जांगिड़ समाज ने एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विवाह समारोहों में फिजूलखर्ची पर रोक लगाकर सामाजिक सुधार की मिसाल पेश की है। समाज के सर्वसम्मति से हुए निर्णय को पूरे राजस्थान ही नहीं बल्कि देशभर में सराहना प्राप्त हो रही है।

समाज द्वारा जारी नए नियमों के अनुसार किसी भी शादी में दुल्हन को उपहार स्वरूप अधिकतम 2 तोला सोना और 10 तोला चांदी से अधिक देना सख्त रूप से प्रतिबंधित होगा। तय सीमा से अधिक देने-लेने की अनुमति नहीं होगी। इस निर्णय का उद्देश्य उपहारों में होने वाली होड़ और आर्थिक बोझ को समाप्त करना है, ताकि कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों पर तनाव न बढ़े और समाज में समानता का वातावरण बने।

जांगिड़ समाज ने विवाह आयोजनों में होने वाले भड़कीले और महंगे प्रचलनों पर भी कड़ा रुख अपनाया है। समाज ने प्री-वेडिंग शूट, डीजे, बैंड-बाजा और अत्यधिक भव्य सजावट वाले आयोजनों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। शादी को सादगीपूर्ण और सात्विक पद्धति से सम्पन्न करने पर जोर दिया गया है। विवाह कार्ड के मामले में भी बड़ा बदलाव किया गया है। समाज ने अपील की है कि निमंत्रण कार्ड साधारण होगा तथा संभव हो तो अधिकतम डिजिटल कार्ड के माध्यम से सोशल मीडिया पर निमंत्रण भेजा जाए। इससे खर्च पर भी नियंत्रण रहेगा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम होगा।

इन निर्णयों के पीछे समाज का उद्देश्य स्पष्ट है — सामाजिक कुरीतियों, दिखावे की होड़ और अनावश्यक खर्च की प्रवृत्ति पर विराम लगाना। समाज के बुजुर्गों और युवाओं ने बैठक में कहा कि वर्तमान समय में सोने-चांदी के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और हर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति एक समान नहीं होती। ऐसे में कई परिवार शादियों को भव्य बनाने की चाह में कर्ज लेकर अथवा जमीन-जायदाद बेचकर समारोह करते हैं, जो आने वाली पीढ़ी पर बोझ बन जाता है। उनके अनुसार अनावश्यक खर्च खुशी नहीं बल्कि परेशानी और अभिशाप बनकर सामने आता है। इसलिए समाज को सामूहिक रूप से कठोर फैसला लेना पड़ा।

जांगिड़ समाज ने इन नियमों के पालन को अनिवार्य बनाते हुए चेतावनी भी दी है कि यदि कोई व्यक्ति आयोजित नियमों का उल्लंघन करेगा, चाहे वह कितना भी धनवान या रसूखदार क्यों न हो, उसके विवाह समारोह का समाज स्तर पर बहिष्कार किया जाएगा। कोई भी समाजजन उस शादी में शामिल नहीं होगा। इस सख्त शर्त के बाद नियमों की गंभीरता और पारदर्शिता को लेकर समाज में सकारात्मक चर्चा हो रही है।

बाड़मेर से लिए गए इस निर्णय की चर्चा सोशल मीडिया और ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों तक तेज़ी से फैल रही है। कई लोग इसे विवाह सुधार आंदोलन की नई शुरुआत बता रहे हैं। जांगिड़ समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि अगर किसी समाज को पहल करनी थी तो हमने साहस दिखाया। उनका मानना है कि यह पहल देश में अन्य समाजों को भी प्रेरित करेगी और आने वाले समय में शादी-विवाह के नाम पर होने वाली फिजूलखर्ची और नशे जैसी कुरीतियों को समाप्त करने का रास्ता साफ होगा।

यह फैसला न केवल आर्थिक बोझ कम करने की दिशा में उठाया गया कदम है, बल्कि विवाह को उसकी मूल सांस्कृतिक गरिमा — दो परिवारों और दो आत्माओं के पवित्र मिलन — की ओर लौटाने का संदेश भी देता है। जांगिड़ समाज के निर्णय ने यह साबित किया है कि वास्तविक सामाजिक सुधार दिखावे से नहीं, बल्कि साहसिक और व्यावहारिक निर्णयों से संभव होता है।

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