मनीषा शर्मा। जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) द्वारा गांधी पथ (वैशाली नगर) पर भगवान शिव मंदिर को अवैध निर्माण बताकर नोटिस जारी करने के मामले ने प्रदेश में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। धार्मिक आस्था से जुड़े स्थल को सीधे ‘‘शिव मंदिर’’ के नाम पर नोटिस देने से स्थानीय लोग नाराज हो गए थे, जिसके बाद मामला तेजी से गंभीर रूप लेता गया। बढ़ते विरोध और प्रशासनिक चूक के संकेत सामने आने पर JDA ने कार्रवाई करते हुए प्रवर्तन अधिकारी अरुण कुमार पूनिया को निलंबित कर दिया। JDA सचिव निशांत जैन ने इसका आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया कि निलंबन अवधि में अधिकारी को नियमों के अनुसार भत्ता मिलेगा और उनका मुख्यालय एडीजीपी (कार्मिक) कार्यालय, जयपुर में रहेगा।
कैसे शुरू हुआ विवाद
गांधी पथ पर सड़क चौड़ीकरण का कार्य लंबे समय से चल रहा है। इस प्रक्रिया में जे डी ए की टीम ने दुकानों, मकानों और अन्य निर्माणों को सर्वे रिपोर्ट के आधार पर अतिक्रमण मानते हुए नोटिस जारी किए थे। इसी क्रम में भगवान शिव मंदिर को भी अवैध निर्माण की श्रेणी में डालकर एक नोटिस चस्पा कर दिया गया।
विवाद की शुरुआत इस बात से हुई कि नोटिस किसी व्यक्ति, समिति या ट्रस्ट के नाम पर जारी करने के बजाय सीधे भगवान शिव मंदिर के नाम जारी किया गया। यह प्रशासनिक दृष्टि से भी गलत माना जाता है, क्योंकि धार्मिक स्थलों के मामलों में आमतौर पर संबंधित प्रबंधन समिति, पुजारी, ट्रस्ट या जिम्मेदार पदाधिकारी के नाम नोटिस दिया जाता है। नोटिस में निर्देश दिया गया था कि मंदिर से जुड़े पक्षकार सात दिनों के भीतर जवाब प्रस्तुत करें।
स्थानीय लोगों ने जताया विरोध
जैसे ही नोटिस की जानकारी क्षेत्र में फैली, स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी देखने को मिली। लोगों ने इसे धार्मिक आस्था पर प्रहार बताया और JDA की कार्रवाई को अनुचित कहा। विरोध की खबरें बढ़ने लगीं, जिसके बाद मामला सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया।
सूत्रों के अनुसार, प्रारंभिक जांच में यह माना गया कि धार्मिक स्थान के लिए नोटिस की प्रकृति और प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही हुई है। इसके बाद सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए प्रवर्तन अधिकारी अरुण कुमार पूनिया को निलंबित कर दिया। सरकार द्वारा यह कदम उठाए जाने के बाद स्थानीय लोगों में कुछ हद तक शांति आई, लेकिन मामला अब भी चर्चा में है क्योंकि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़े प्रश्न खड़े करता है।
नोटिस में क्या लिखा था
JDA प्रवर्तन शाखा की ओर से चस्पा किए गए नोटिस में हाईकोर्ट की पिटीशन संख्या 658/2024 का हवाला दिया गया था। इसमें कहा गया था कि सड़क चौड़ीकरण से संबंधित पीटी सर्वे रिपोर्ट जोन-7 के उपायुक्त द्वारा उपलब्ध कराई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, मंदिर की बाउंड्री वॉल सड़क की सीमा रेखा में लगभग 1.59 मीटर अंदर पाई गई, जिसे अतिक्रमण मानते हुए नोटिस जारी किया गया। JDA ने इसे हटाने की चेतावनी दी थी और सात दिनों में जवाब माँगा था। मगर विवाद इस बात पर खड़ा हुआ कि नोटिस सीधे ‘‘शिव मंदिर’’ के नाम पर क्यों जारी किया गया, जबकि प्रशासनिक नियम स्पष्ट हैं कि धार्मिक स्थलों पर नोटिस संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों या संगठनों के नाम जाना चाहिए।
प्रशासनिक चूक की खुली परतें
सूत्रों और प्रशासनिक विशेषज्ञों के अनुसार, धार्मिक आस्था से जुड़े स्थानों पर कार्रवाई करते समय सावधानी बरतना अनिवार्य माना जाता है। अक्सर ऐसे मामलों में पहले सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की जाती है, सर्वे रिपोर्ट दोबारा जांची जाती है और यदि कोई निर्माण वाकई अतिक्रमण में आता है, तो नोटिस समिति या जिम्मेदार पक्ष को दिया जाता है। इस मामले में यह प्रक्रिया सही तरह से नहीं अपनाई गई, जिसके कारण विवाद बढ़ा और सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा।
JDA की आगे की रणनीति
निलंबन के बाद JDA अब पूरे मामले की विस्तृत जांच कराएगा। उम्मीद है कि सर्वे रिपोर्ट, नोटिस प्रक्रिया, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और धार्मिक स्थलों के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल की समीक्षा की जाएगी। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न हो, इसके लिए निर्देश जारी किए जा रहे हैं। साथ ही, सड़क चौड़ीकरण का कार्य जारी रहेगा, लेकिन धार्मिक स्थलों और संवेदनशील निर्माणों के संबंध में अधिक सतर्कता बरती जाएगी।


