मनीषा शर्मा। राजस्थान सरकार ने आगामी पंचायत और नगर निकाय चुनावों से पहले एक बड़ा निर्णय लेने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। राज्य सरकार अब उन उम्मीदवारों के लिए रास्ता खोलने जा रही है, जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। इसके लिए राजस्थान पंचायती राज अधिनियम और राजस्थान नगर निगम अधिनियम में संशोधन की तैयारी चल रही है। सरकार अध्यादेश के माध्यम से इन अधिनियमों में मौजूद “दो बच्चे की शर्त” को हटाने जा रही है, ताकि अधिक लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर मिल सके।
अध्यादेश लाने की प्रक्रिया शुरू
राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव पर औपचारिक रूप से काम शुरू कर दिया है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, अध्यादेश लाने की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। इसका उद्देश्य यह है कि दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति को पंचायती राज संस्थाओं या नगर निकायों के चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने वाली बाध्यता को समाप्त किया जा सके।
अब तक, इस नियम के चलते राज्य में हजारों संभावित उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ पाते थे। सरकार का मानना है कि यह प्रावधान अब समाज की वर्तमान सामाजिक और जनसंख्या संरचना के अनुरूप नहीं है, इसलिए इसे संशोधित करना आवश्यक है।
विधि विभाग को भेजा गया अध्यादेश का मसौदा
सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित अध्यादेश का प्रारूप पंचायती राज विभाग द्वारा तैयार कर विधि विभाग को समीक्षा के लिए भेजा गया है। विधि विभाग की स्वीकृति मिलने के बाद यह प्रस्ताव राज्य मंत्रिमंडल (कैबिनेट) के समक्ष अंतिम मंजूरी के लिए रखा जाएगा।
सरकार का लक्ष्य है कि आगामी पंचायत और नगर निकाय चुनावों से पहले यह संशोधन लागू कर दिया जाए ताकि जिन उम्मीदवारों के दो से अधिक बच्चे हैं, वे भी चुनाव में भाग ले सकें।
क्या कहता है 1995 का दो-बच्चे वाला नियम
राजस्थान में “दो बच्चे” का नियम वर्ष 1995 में लागू किया गया था। इसके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के 27 नवंबर 1995 के बाद तीसरा बच्चा हुआ है, तो वह पंचायत या नगर निकाय के चुनावों के लिए अयोग्य माना जाएगा।
यह प्रावधान राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 और राजस्थान नगर निगम अधिनियम 2009 की संबंधित धाराओं में शामिल है। इस नियम के अंतर्गत पंच, सरपंच, उपसरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, प्रधान, जिला प्रमुख, पार्षद, सभापति और महापौर जैसे सभी स्थानीय जनप्रतिनिधि पद आते हैं।
इस कानून का उद्देश्य राज्य में परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करना था। हालांकि, समय के साथ इसकी उपयोगिता और सामाजिक प्रभाव को लेकर लगातार बहस होती रही है।
सरकार क्यों कर रही है संशोधन की तैयारी
राज्य सरकार का मानना है कि यह नियम अब व्यवहारिक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक नहीं रहा है। कई बार यह भी देखा गया है कि ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में परिवार नियोजन के संसाधनों की कमी के कारण लोग अनजाने में इस नियम की चपेट में आ जाते हैं।
इसके अलावा, कई सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने लंबे समय से इस नियम को हटाने की मांग की थी। उनका तर्क है कि “दो बच्चों का नियम” लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करता है, क्योंकि इससे योग्य उम्मीदवार सिर्फ पारिवारिक कारणों से चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं।
राज्य सरकार का कहना है कि इस अध्यादेश से ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होगी, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत होगी।
कैबिनेट मंजूरी के बाद लागू होगा अध्यादेश
विधि विभाग से मंजूरी मिलने के बाद, यह प्रस्ताव राज्य कैबिनेट में पेश किया जाएगा। कैबिनेट की स्वीकृति के बाद अध्यादेश को राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा। इसके लागू होने के बाद दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को अब चुनाव लड़ने से नहीं रोका जाएगा।
अगर यह संशोधन लागू हो जाता है, तो यह राजस्थान की स्थानीय स्वशासन व्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित होगा। इससे पंचायत से लेकर नगर निगम तक के चुनावों में उम्मीदवारों की संख्या और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ने की संभावना है।


