मनीषा शर्मा। राजस्थान सरकार ने जोधपुर शहर की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। अब शहर में दो अलग-अलग नगर निगमों—उत्तर और दक्षिण—की जगह केवल एक ही नगर निगम होगा। यह निर्णय दोनों निगमों का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद लिया गया है। सरकार का कहना है कि इससे न केवल प्रशासनिक ढांचे में सुधार होगा बल्कि शहर के विकास कार्यों की गति भी बढ़ेगी।
रविवार रात को नगर निगम जोधपुर उत्तर और दक्षिण दोनों के निर्वाचित बोर्डों का कार्यकाल समाप्त हो गया। इसके साथ ही दोनों निगमों का अस्तित्व खत्म हो गया है। अब से जोधपुर का पूरा शहरी प्रशासन एक ही निगम के अधीन रहेगा, जिसमें कुल 100 वार्ड बनाए जाएंगे।
दो निगमों का अंत, एक निगम का जन्म
पिछले पांच वर्षों से जोधपुर में दो अलग-अलग नगर निगम संचालित हो रहे थे—उत्तर में कांग्रेस का बोर्ड था जबकि दक्षिण में भाजपा की सत्ता थी। दोनों निगमों में 80-80 पार्षद थे जो अपने-अपने क्षेत्रों में नगर निकाय की जिम्मेदारी संभालते थे। लेकिन दो निगमों के कारण न केवल नीतिगत असंगतियां पैदा हो रही थीं बल्कि कई विकास कार्यों में भी समन्वय की कमी दिखाई दे रही थी।
राज्य सरकार ने अब इन दोनों निकायों को मिलाकर एकीकृत नगर निगम बनाने का निर्णय लिया है, जिससे शहर का प्रशासन एक ही प्लेटफॉर्म से संचालित होगा। नए निगम में 100 पार्षदों की व्यवस्था होगी। इससे शहर का प्रशासनिक खर्च घटेगा, निर्णय प्रक्रिया सरल होगी और एक समान विकास योजनाओं को लागू करने में आसानी होगी।
प्रशासक के रूप में प्रतिभा सिंह को मिली जिम्मेदारी
राज्य सरकार ने नए निगम के गठन तक की जिम्मेदारी संभागीय आयुक्त प्रतिभा सिंह को सौंपी है। उन्हें नगर निगम जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया गया है। सोमवार से वे निगम के सभी कामकाज की जिम्मेदारी संभालेंगी।
जब तक चुनाव नहीं होते और नया निर्वाचित बोर्ड गठित नहीं होता, तब तक शहर का पूरा प्रबंधन प्रशासन के नियंत्रण में रहेगा। नगर निगम की सभी नीतियां, बजट और योजनाएं अब प्रशासक के निर्देशन में संचालित होंगी।
राज्य सरकार का मानना है कि यह कदम जोधपुर जैसे मध्यम आकार के शहर के लिए लाभकारी साबित होगा, जहां दो नगर निगमों की मौजूदगी के कारण कई बार समन्वय की समस्याएं और संसाधनों का बिखराव देखा गया।
पूर्व पार्षदों और नागरिकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, जोधपुर के नागरिकों और पूर्व पार्षदों ने इस निर्णय पर अपनी राय दी है। एक पूर्व पार्षद ने कहा कि “दो निगमों के चलते शहर का काम बंटा हुआ था और कई परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पा रही थीं। अब एक निगम होने से विकास कार्यों की गति तेज होगी और वित्तीय बोझ कम होगा।”
दूसरी ओर, कुछ नागरिकों ने चिंता जताई कि निर्वाचित पार्षदों के अभाव में अब जनता और प्रशासन के बीच की कड़ी कमजोर हो जाएगी। उन्हें अब सीधे अधिकारियों के माध्यम से काम करवाना होगा, जो कभी-कभी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
विकास कार्यों पर पड़ेगा असर
प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि नगर निगमों के विलय से कई स्तरों पर फायदे होंगे। शहर के बजट का बेहतर उपयोग हो सकेगा, सफाई व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति, सड़क और सीवरेज जैसी सुविधाओं में एकरूपता आएगी। अब अलग-अलग निगमों के बीच जिम्मेदारी को लेकर भ्रम की स्थिति समाप्त होगी।
वहीं, नए निगम में 100 वार्डों की संरचना से प्रतिनिधित्व भी बेहतर होगा और शहर के सभी हिस्सों को समान रूप से विकास योजनाओं में शामिल किया जा सकेगा।


