मनीषा शर्मा। कोटा के वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय (वीएमओयू) में गुरुवार को “सामाजिक समरसता के प्रतीक श्रीराम” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। संगोष्ठी में मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के आचार्य प्रो. रामनाथ झा, विशिष्ट अतिथि कोटा विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. बी.पी. सारस्वत, और अध्यक्षता वीएमओयू के कुलगुरु प्रो. बी.एल. वर्मा ने की।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में प्रोफेसर रामनाथ झा ने भगवान श्रीराम को सामाजिक समरसता और मर्यादा के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भगवान राम इसलिए ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहलाए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को नियम, अनुशासन और मर्यादा के साथ पूरा किया। वे समाज के सभी वर्गों का सम्मान करते थे — चाहे वह स्त्रियाँ हों, वंचित वर्ग हो या अन्य कोई समाज का अंग। प्रो. झा ने कहा, “राम ने वंचितों को साथ लेकर चलने की परंपरा दी और समानता का भाव समाज में फैलाया।”
प्रो. झा ने आगे कहा कि पश्चिमी समाजों में परिवार और सामाजिक नियमों की अवधारणा समाप्त हो चुकी है, इसलिए वहां समरसता संभव नहीं। उनके अनुसार, समरसता केवल भारत जैसे देश में संभव है, जहां परिवार, संस्कार और समाज आज भी जीवित हैं।
‘राम से बड़ा कोई समरसता का प्रतीक नहीं’ — मदन दिलावर
मुख्य अतिथि शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने अपने उद्बोधन में कहा कि जब हम सभी इस धरती मां से उत्पन्न हुए, तब समाज में कोई ऊंच-नीच नहीं था। भेदभाव और विषमता तो बाद में स्वार्थवश मनुष्यों ने उत्पन्न की। उन्होंने कहा, “राम से बड़ा कोई सेवाभावी और समरसता का भाव जगाने वाला नहीं हुआ।” दिलावर ने लोगों से आह्वान किया कि यदि हम सब एकजुट होकर विषमताओं को दूर करें, तो एक बेहतर समाज का निर्माण संभव है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की असली शक्ति उसकी एकता, विविधता और पारिवारिक मूल्यों में निहित है। पश्चिम की नकल करने के बजाय हमें अपने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आदर्शों को अपनाना चाहिए, ताकि समरस समाज का निर्माण हो सके।
सनातन संस्कृति और युवाओं की भूमिका
विशिष्ट अतिथि प्रो. बी.पी. सारस्वत ने अपने संबोधन में कहा कि अब समय आ गया है कि सनातन संस्कृति को तोड़ने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भगवान राम का जीवन समाज को जोड़े रखने का सबसे बड़ा उदाहरण है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रो. बी.एल. वर्मा ने कहा कि आज के युवाओं को भगवान राम के आदर्शों से सीख लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राम का अनुशासन, न्यायप्रियता और त्याग युवाओं के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत हैं। प्रो. वर्मा ने युवाओं से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में इन आदर्शों को अपनाएं और सामाजिक समरसता को आगे बढ़ाएं।
तकनीकी सत्रों में 62 शोध पत्रों का वाचन
कार्यक्रम के लंच से पहले दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। पहले सत्र में गांधी भवन में 32 प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए, जिसकी अध्यक्षता प्रो. क्षमता चौधरी ने की और मॉडरेटर डॉ. सुरेंद्र कुलश्रेष्ठ रहे।
दूसरे तकनीकी सत्र में 30 शोध पत्रों का वाचन हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्रो. अनुराधा दुबे और संचालन डॉ. संदीप हुडा ने किया।
संगोष्ठी में देशभर से 90 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. सुबोध कुमार ने किया, जबकि स्वागत भाषण डॉ. कपिल गौतम ने दिया और कुलसचिव एम.सी. मीणा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
समापन सत्र और पौधरोपण
समापन सत्र के मुख्य अतिथि कोटा दक्षिण के विधायक संदीप शर्मा रहे। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम सभी के आदर्श हैं और सामाजिक समरसता के सच्चे प्रतीक हैं। उनका चरित्र युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।
विशिष्ट अतिथि आरटीयू के कुलगुरु प्रो. निमित रंजन चौधरी ने कहा कि आज समाज को उस आध्यात्मिक दिशा की आवश्यकता है, जो समरसता को प्रोत्साहन दे सके।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर और प्रो. सारस्वत ने विश्वविद्यालय परिसर में पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।


