शोभना शर्मा। राजस्थान के सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने सवाल उठाया है कि आखिर 86 हजार जर्जर स्कूल कमरों की मरम्मत सीमित समय में कैसे संभव होगी। कोर्ट ने सरकार द्वारा पेश किए गए एक्शन प्लान को अधूरा और अस्पष्ट बताते हुए इसे दोबारा संशोधित कर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
यह मामला झालावाड़ जिले के स्कूल हादसे से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई गुरुवार (6 नवंबर) को जस्टिस महेंद्र गोयल और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ में हुई। अदालत ने कहा कि सरकार के जवाब से यह स्पष्ट नहीं होता कि सभी जर्जर भवनों की मरम्मत कब और किस तरीके से की जाएगी।
कोर्ट ने कहा – धरातल पर काम करें, चुनावी वादों से नहीं
खंडपीठ ने सरकार के प्रस्तुत एक्शन प्लान पर नाराजगी जताते हुए कहा कि “आप 2047 के विजन की बात करते हैं, लेकिन स्कूलों के लिए कल की योजना भी स्पष्ट नहीं है।” अदालत ने यह भी कहा कि सरकार को सिर्फ चुनावी वादों के बजाय वास्तविक कार्य योजना पर ध्यान देना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा विभाग का यह प्लान अधूरा है और इसमें यह नहीं बताया गया है कि जिन कमरों की मरम्मत की जानी है, उनका चयन किन मानकों पर किया गया है और इन कार्यों की निगरानी कैसे होगी।
सरकार के सर्वे में सामने आए 86 हजार जर्जर कमरे
राज्य सरकार के सर्वे के अनुसार, राजस्थान के सरकारी स्कूलों में करीब 86 हजार कक्षाएं जर्जर हालत में हैं, जिनमें कई स्कूल ऐसे भी हैं जहां बच्चों की सुरक्षा खतरे में है। कोर्ट ने कहा कि “सरकार ने इन कमरों की मरम्मत का जो खाका पेश किया है, उसमें यह स्पष्ट नहीं है कि मरम्मत कार्य कब तक पूरा होगा और प्राथमिकता किन क्षेत्रों को दी जाएगी।”
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह प्रत्येक जिले के हिसाब से भवन मरम्मत का पूरा रोडमैप, बजट आवंटन और कार्य पूर्णता की समय-सीमा बताने वाली विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
कोर्ट का सवाल – सीमित समय में कैसे होगी मरम्मत?
इस सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की ओर से एडवोकेट वागीश सिंह उपस्थित हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार का वर्तमान एक्शन प्लान “औपचारिक जवाब” जैसा है और इसमें वास्तविक अमल की रूपरेखा नहीं दिखाई देती।
अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि “जब प्रदेश में इतने बड़े पैमाने पर स्कूल भवन जर्जर स्थिति में हैं, तो सीमित संसाधनों और समय में इनकी मरम्मत कैसे की जाएगी?”
कोर्ट ने सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह वित्तीय प्रावधान, निर्माण एजेंसी, सुरक्षा मानक और कार्य गुणवत्ता से संबंधित विवरण अगली सुनवाई से पहले पेश करे।
कोर्ट ने दी स्कूल सेफ्टी गाइडलाइन का हवाला
खंडपीठ ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के अविनाश मेहरोत्रा बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख किया। उस निर्णय में कहा गया था कि सभी राज्य सरकारों को नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट गाइडलाइन फॉर स्कूल सेफ्टी (2016) का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि “क्या वर्तमान में राजस्थान के सरकारी स्कूल भवन इन गाइडलाइनों के अनुरूप बनाए या सुधारे जा रहे हैं?” साथ ही कोर्ट ने सरकार से इस पर एफिडेविट (शपथ पत्र) दाखिल करने को कहा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि स्कूल सुरक्षा नीति का पालन कितना किया जा रहा है।
सरकार का रोडमैप अधूरा, रिपोर्ट में स्पष्टता का अभाव
खंडपीठ ने कहा कि सरकार द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कई अस्पष्टताएं हैं। इसमें यह नहीं बताया गया है कि—
किन कमरों की मरम्मत तत्काल आवश्यक है,
किन स्कूलों को प्राथमिकता दी जाएगी,
और कार्य की निगरानी के लिए कौन-सी एजेंसी जिम्मेदार होगी।
कोर्ट ने कहा कि सरकार को तथ्यात्मक, तकनीकी और वित्तीय दृष्टि से ठोस रिपोर्ट तैयार करनी होगी। केवल कागजों में रोडमैप पेश करने से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
24 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
कोर्ट ने राज्य सरकार को दोबारा रिपोर्ट पेश करने के लिए 24 नवंबर की अगली तारीख दी है। अदालत ने कहा कि अगर इस बार भी रिपोर्ट अधूरी पाई गई तो वह राज्य सरकार के मुख्य सचिव और शिक्षा विभाग के प्रमुख अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से स्पष्टीकरण देने के लिए बुला सकती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21-ए के तहत राज्य की जिम्मेदारी है, और इस पर किसी भी प्रकार की लापरवाही अस्वीकार्य होगी।


