शोभना शर्मा, अजमेर । राजस्थान का पवित्र तीर्थ पुष्कर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है बल्कि भारतीय संस्कृति और पुराणों की गहराई में बसी आस्था की प्रतीक भूमि भी है। अजमेर जिले से करीब 11 किलोमीटर दूर, अरावली पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसे पुष्कर कस्बे को “तीर्थराज पुष्कर” कहा जाता है। पुराणों में इसे सभी तीर्थों में सर्वोच्च बताया गया है।
पुष्कर की उत्पत्ति: सृष्टि यज्ञ और कमल पुष्प की कथा
पद्म पुराण के सृष्टि खंड में उल्लेख है कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ करने से पूर्व एक पवित्र स्थल की आवश्यकता महसूस की। इसके लिए उन्होंने कमल पुष्प का शस्त्र चलाया, जिसकी पंखुड़ियां तीन स्थानों पर गिरीं। इन तीन स्थानों से जलधाराएं फूट पड़ीं और वे ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर के रूप में विख्यात हुए। यही तीन सरोवर आज भी अस्तित्व में हैं और पुष्कर की पवित्रता का आधार माने जाते हैं। पद्म पुराण के अनुसार, ज्येष्ठ पुष्कर सरोवर में भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि यज्ञ संपन्न किया था। यहीं से पृथ्वी पर सृष्टि की शुरुआत हुई मानी जाती है।
सावित्री और गायत्री की कथा: श्राप से जुड़ा अद्भुत प्रसंग
सृष्टि यज्ञ के दौरान ब्रह्मा जी ने अपनी धर्मपत्नी सावित्री देवी को बुलाने के लिए पुत्र नारद को भेजा। लेकिन सावित्री देवी समय पर यज्ञ में नहीं पहुंच सकीं। यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकल जाने की स्थिति में ब्रह्मा जी ने नंदगांव की एक गुर्जर कन्या को मंत्रोच्चार द्वारा “गायत्री” नाम देकर उसके साथ यज्ञ किया। जब सावित्री पहुंचीं और उन्होंने यह देखा तो वे अत्यंत रुष्ट हुईं। क्रोधित होकर उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि उनकी पूजा केवल पुष्कर में ही होगी, घर-घर में नहीं। इसी कारण आज तक भगवान ब्रह्मा की पूजा केवल पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर में ही की जाती है।
पुष्कर मेला: सृष्टि यज्ञ से जुड़ी हजारों साल पुरानी परंपरा
ब्रह्मा जी द्वारा किए गए सृष्टि यज्ञ की स्मृति में हर वर्ष कार्तिक मास की एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिवसीय पुष्कर मेला आयोजित किया जाता है। यह मेला धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन दिनों पुष्कर सरोवर में स्नान करने से सभी पापों से मुक्ति प्राप्त होती है। पुष्कर मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान भी बन चुका है। यहां ऊंट और पशु मेला, लोक नृत्य, पारंपरिक संगीत और ग्रामीण हस्तशिल्प का भव्य संगम देखने को मिलता है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इस पावन अवसर पर पुष्कर पहुंचते हैं।
पुष्कर के पांच प्रमुख मंदिर
पुष्कर में कहा जाता है कि “घर-घर में मंदिर और घाट-घाट पर पूजा” होती है। हालांकि धार्मिक दृष्टि से यहां पांच प्रमुख मंदिरों का विशेष महत्व है:
ब्रह्मा मंदिर: यह विश्व का एकमात्र मंदिर है जहां भगवान ब्रह्मा की मूर्ति की पूजा होती है। यहां ब्रह्मा जी के साथ उनकी पत्नी गायत्री देवी की प्रतिमा भी विराजमान है।
वराह मंदिर: भगवान विष्णु के वराह अवतार को समर्पित यह मंदिर पुष्कर के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है।
रंगनाथ वेणुगोपाल मंदिर: श्रीकृष्ण और राधा को समर्पित यह मंदिर दक्षिण भारतीय शैली की अद्भुत झलक पेश करता है।
रमा बैकुंठ नाथ मंदिर: इस मंदिर की नक्काशी और स्थापत्य कला अद्वितीय है।
अटमटेश्वर महादेव मंदिर: यहां स्वयंभू शिवलिंग की पूजा होती है, जो पुष्कर के धार्मिक माहौल को और अधिक पवित्र बनाता है।
पुष्कर सरोवर: आस्था और पवित्रता का प्रतीक
पुष्कर सरोवर को इस तीर्थ की आत्मा कहा जाता है। कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी के कमल पुष्प की पंखुड़ी पृथ्वी पर गिरी, तभी वहां गाय के खुर जैसी आकृति में जलधारा फूट पड़ी। बाद में जोधपुर के महाराजा नाहर राव पडिहार ने इस सरोवर का जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद राजस्थान के विभिन्न राजघरानों — कोटा, बीकानेर, सीकर, जयपुर, किशनगढ़, भरतपुर और ग्वालियर — के राजाओं ने सरोवर के किनारे सुंदर घाट बनवाए। आज यहां कुल 52 घाट हैं, जिनमें से ब्रह्म घाट, गौ घाट और वराह घाट सबसे प्रसिद्ध हैं। मध्य पुष्कर में अब पानी नहीं बचा है, जबकि कनिष्ठ पुष्कर को “रुद्र पुष्कर” या “बूढ़ा पुष्कर” कहा जाता है।
धार्मिक महत्व और आस्था
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति पुष्कर सरोवर में स्नान करता है, उसे जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन लाखों श्रद्धालु सरोवर में आस्था की डुबकी लगाते हैं। साथ ही ब्रह्मा मंदिर और अन्य तीर्थस्थलों के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।
पुष्कर पहुंचने का मार्ग
पुष्कर की भौगोलिक स्थिति इसे देश-विदेश के यात्रियों के लिए सुगम बनाती है।
रेलमार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन अजमेर है, जो केवल 11 किलोमीटर दूर स्थित है।
सड़क मार्ग: जयपुर से पुष्कर की दूरी लगभग 150 किलोमीटर है और सड़क मार्ग से यहां तक पहुंचने में लगभग 3 घंटे लगते हैं।
वायुमार्ग: निकटतम एयरपोर्ट किशनगढ़ (अजमेर एयरपोर्ट) है, जो पुष्कर से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
तीर्थराज पुष्कर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और इतिहास का संगम है। यहां का ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर सरोवर, और पांच दिवसीय पुष्कर मेला हर वर्ष करोड़ों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। ब्रह्मा जी की सृष्टि से जुड़ी यह भूमि न केवल हिंदू श्रद्धालुओं के लिए पवित्र है, बल्कि यह राजस्थान के गौरव और भारतीय संस्कृति की जीवंत पहचान भी है।


