मनीषा शर्मा। राजस्थान में ‘मंगला पशु बीमा योजना’ एक बार फिर राजनीतिक विवादों में है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने रविवार को बीजेपी सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि यह योजना केवल कागजों और घोषणाओं में चल रही है, जमीनी स्तर पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता। जूली ने कहा कि कांग्रेस शासनकाल में जब कामधेनु पशु बीमा योजना लागू की गई थी, तब 80 लाख से अधिक पशुओं का पंजीकरण हुआ था, जबकि बीजेपी सरकार में यह संख्या घटकर सिर्फ 20 लाख रह गई है।
बीजेपी सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप
टीकाराम जूली ने कहा कि बीजेपी ने अपने 2023 के चुनावी घोषणा पत्र में इस योजना को बड़े वादे के रूप में पेश किया था और दावा किया था कि यह राज्य के पशुपालकों को आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाएगी। जूली ने कहा, “बीजेपी ने इस योजना को केवल प्रचार का माध्यम बनाया, लेकिन एक साल बाद भी यह केवल कागजों पर और बयानों तक सीमित है। न तो बीमा की प्रक्रिया तेज हुई और न ही दावों का निपटान सही तरीके से किया जा रहा है।” उन्होंने आगे कहा कि “पशुपालकों के हित की इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल देना, सरकार की असंवेदनशीलता को दर्शाता है। जिन किसानों और पशुपालकों की आजीविका पशुधन पर निर्भर है, उनके साथ यह सीधा विश्वासघात है।”
कांग्रेस सरकार की ‘कामधेनु योजना’ थी आधार
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई कामधेनु पशु बीमा योजना के तहत पंजीकरण का काम लगभग पूरा हो चुका था। केवल सर्वे और बीमा कवरेज की प्रक्रिया बाकी थी, लेकिन बीजेपी सरकार के आने के बाद इस योजना को पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। उन्होंने कहा कि करीब एक साल तक कोई नई बीमा योजना लागू नहीं की गई, जिससे लाखों पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। जूली ने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार ने पिछले बजट में जो वादे किए, वे कागजों से बाहर नहीं आए।
बीमा दावों की स्थिति चिंताजनक
टीकाराम जूली ने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि अब तक 9 हजार पशु बीमा दावे दर्ज किए गए हैं, लेकिन इनमें से केवल 700 दावे ही स्वीकृत हुए हैं। यानी महज 10 प्रतिशत से भी कम दावे स्वीकार किए गए हैं। उन्होंने कहा कि “यह आंकड़ा बीजेपी सरकार के वादों और उसकी जमीनी सच्चाई के बीच की खाई को उजागर करता है। जिन किसानों और पशुपालकों ने उम्मीद के साथ बीमा करवाया था, वे आज दर-दर भटक रहे हैं।” जूली ने कहा कि बीमा प्रक्रिया में देरी और भुगतान की कमी से कई पशुपालकों को अपने मवेशियों के नुकसान का मुआवजा नहीं मिल पा रहा। “ऐसे में सरकार की नीतियां सिर्फ दिखावे की रह गई हैं,” उन्होंने कहा।
राजस्थान का पशुधन, पर सरकार की अनदेखी
राजस्थान देश का दूसरा सबसे बड़ा पशुधन वाला राज्य है, जहां लाखों परिवारों की आजीविका पशुपालन पर निर्भर है। ऐसे में पशुधन बीमा योजना का ठप होना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर झटका है। जूली ने कहा कि “राजस्थान के पशुपालक मेहनत करते हैं, लेकिन सरकार ने इस वर्ग को सिर्फ वोट बैंक के रूप में देखा है। भाजपा की नीतियां इस बात का सबूत हैं कि सरकार किसानों और पशुपालकों के प्रति कितनी असंवेदनशील है।” उन्होंने कहा कि पशुधन बीमा योजना केवल पशु संरक्षण का मामला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिरता से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
सरकार की धीमी कार्यशैली पर भी सवाल
टीकाराम जूली ने आरोप लगाया कि 2024-25 के बजट में घोषित योजनाओं को लागू करने की गति बेहद धीमी रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार अब 2025-26 के बजट में केवल बीमा सीमा बढ़ाने की बात कर रही है, जबकि वास्तविक लाभ जमीन पर कहीं नहीं दिखता। “बीमा की सीमा बढ़ाने से कुछ नहीं होगा, जब तक कि दावे निपटाने और पंजीकरण की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी,” उन्होंने कहा। जूली ने यह भी कहा कि सरकार को पहले यह बताना चाहिए कि अब तक कितने किसानों और पशुपालकों को मुआवजा दिया गया है, और कितने दावे लंबित हैं।
राज्य सरकार से जूली की मांग
नेता प्रतिपक्ष ने मांग की कि राजस्थान सरकार जल्द से जल्द एक व्यापक पशुधन बीमा योजना लागू करे, जिसमें सभी पशुपालक शामिल हो सकें। उन्होंने कहा कि बीमा प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाए, ताकि कोई भी पशुपालक दलालों या अधिकारियों की मनमानी का शिकार न हो। टीकाराम जूली ने यह भी कहा कि राज्य सरकार को चाहिए कि वह कांग्रेस शासनकाल की कामधेनु योजना को पुनर्जीवित करे और उन पशुपालकों को मुआवजा दे, जिन्होंने बीमा योजना के ठप पड़ने से नुकसान झेला है।
राजनीतिक मायने और भविष्य की दिशा
‘मंगला पशु बीमा योजना’ को लेकर उठी यह बहस न केवल नीति की विफलता का मुद्दा है, बल्कि यह राजनीतिक विमर्श का केंद्र भी बन गई है। कांग्रेस इसे बीजेपी की नाकामी के रूप में पेश कर रही है, जबकि बीजेपी का दावा है कि योजना को जल्द बेहतर ढंग से लागू किया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजस्थान जैसे राज्य में, जहां पशुपालन और कृषि एक साथ चलती हैं, वहां ऐसी योजनाओं का असर सीधे ग्रामीण वोट बैंक पर पड़ता है।


