मनीषा शर्मा, अजमेर। अजमेर दरगाह में शिव मंदिर होने के दावे को लेकर चल रही कानूनी प्रक्रिया में एक बार फिर सुनवाई टल गई है। शनिवार को होने वाली सुनवाई अब 3 जनवरी 2025 को होगी। सिविल कोर्ट में यह मामला हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि अजमेर की प्रसिद्ध दरगाह दरअसल प्राचीन संकट मोचन महादेव मंदिर के अवशेषों पर बनाई गई है। याचिकाकर्ता के वकील विजय शर्मा ने बताया कि कोर्ट में दरगाह कमेटी द्वारा प्रस्तुत “याचिका खारिज करने” के प्रार्थना पत्र पर बहस होनी थी, लेकिन प्रशासनिक कारणों से सुनवाई स्थगित कर दी गई। अब इस पर अगली तारीख 3 जनवरी 2025 तय की गई है।
पिछली सुनवाई में ASI और अल्पसंख्यक विभाग की याचिका खारिज
इससे पहले 30 अगस्त 2024 को हुई सुनवाई में कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) और अल्पसंख्यक विभाग द्वारा दायर प्रार्थना पत्रों को खारिज कर दिया था। अदालत ने केवल दरगाह कमेटी के पक्ष पर बहस जारी रखने का आदेश दिया था। अदालत अब यह तय करेगी कि क्या विष्णु गुप्ता की ओर से पेश किए गए ऐतिहासिक और भौतिक सबूतों पर आगे सुनवाई जारी रखी जाए या नहीं।
हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता के तीन प्रमुख आधार
विष्णु गुप्ता ने अपने दावे के समर्थन में तीन मुख्य आधार कोर्ट के समक्ष रखे हैं —
दरवाजों की बनावट और नक्काशी:
गुप्ता का कहना है कि अजमेर दरगाह में मौजूद बुलंद दरवाजों की बनावट पारंपरिक हिंदू मंदिरों की तरह है। दरवाजों पर बनी नक्काशी में भी मंदिरों में दिखने वाले आकृतियों और शिल्प का प्रभाव साफ नजर आता है।ऊपरी संरचना और गुंबद:
उन्होंने दावा किया कि दरगाह की ऊपरी संरचना और गुंबद हिंदू मंदिरों के अवशेषों जैसी प्रतीत होती हैं। उनका कहना है कि गुंबदों को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां पहले किसी प्राचीन शिव मंदिर को तोड़कर दरगाह का निर्माण किया गया।पानी और झरनों की उपस्थिति:
गुप्ता ने तर्क दिया कि जहां भी शिव मंदिर होता है, वहां प्राकृतिक जल स्रोत या झरना अवश्य होता है। अजमेर दरगाह परिसर में भी इसी प्रकार का जल स्रोत मौजूद है, जो उनके अनुसार इस स्थल के मंदिर होने के दावे को मजबूत करता है।
संस्कृत ग्रंथ “पृथ्वीराज विजय” का हवाला
विष्णु गुप्ता ने अपने दावे के समर्थन में एक प्राचीन ग्रंथ “पृथ्वीराज विजय” (1250 ईस्वी) का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि यह ग्रंथ संस्कृत में लिखा गया है और इसमें अजमेर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विस्तृत वर्णन है। गुप्ता का दावा है कि इस ग्रंथ में भी यह उल्लेख है कि जिस स्थान पर आज दरगाह शरीफ स्थित है, वहां पहले एक शिव मंदिर था। वे इसका हिंदी अनुवाद भी कोर्ट में प्रस्तुत करने की तैयारी में हैं।
वर्शिप एक्ट को लेकर भी उठे सवाल
गुप्ता ने बताया कि यह पूरा विवाद “वर्शिप एक्ट (Places of Worship Act)” के दायरे से बाहर है। उनका कहना है कि यह कानून उन धार्मिक स्थलों पर लागू होता है जो मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरुद्वारे के रूप में स्थापित हैं। लेकिन अजमेर दरगाह एक “दरगाह” के रूप में पंजीकृत है, जिसे वे “ऑथराइज्ड धार्मिक स्थल” बताते हैं। इसलिए, गुप्ता के अनुसार, यह स्थल वर्शिप एक्ट के अंतर्गत नहीं आता। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में भी इसी मुद्दे पर हिंदू सेना के वकील वरुण कुमार सेना ने बहस की है और कहा है कि पूजा अधिनियम का प्रयोग दरगाह जैसे स्थलों पर लागू नहीं होता।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
इस मामले के संवेदनशील होने के चलते अजमेर पुलिस ने याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता को सुरक्षा मुहैया कराई है। एसपी वंदिता राणा के निर्देश पर उन्हें पुलिस प्रोटेक्शन दिया गया है। प्रशासन ने कहा कि कोर्ट में अगली सुनवाई तक स्थिति पर पूरी नजर रखी जाएगी ताकि किसी प्रकार का सामाजिक या सांप्रदायिक तनाव न उत्पन्न हो।
2024 में शुरू हुआ था मामला
गौरतलब है कि हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने वर्ष 2024 में अजमेर सिविल कोर्ट में यह याचिका दाखिल की थी। इसमें उन्होंने दावा किया था कि वर्तमान में स्थित दरगाह शरीफ परिसर में पहले संकट मोचन महादेव मंदिर था। कोर्ट ने 27 नवंबर 2024 को याचिका स्वीकार करते हुए अल्पसंख्यक मंत्रालय, दरगाह कमेटी अजमेर, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) को नोटिस जारी किए थे। मामले की जटिलता और संवेदनशीलता को देखते हुए अब इस पर सुनवाई लंबी चलने की संभावना है।
अगली सुनवाई 3 जनवरी 2025 को
अदालत में अगली सुनवाई की तारीख 3 जनवरी 2025 तय की गई है। इस दिन दरगाह कमेटी की ओर से पेश किए गए “याचिका खारिज करने” के आवेदन पर बहस होगी। इसके बाद अदालत यह निर्णय करेगी कि क्या हिंदू सेना के ऐतिहासिक दस्तावेजों और सबूतों को स्वीकार किया जाए या नहीं। यह मामला अब केवल धार्मिक या ऐतिहासिक नहीं, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इसके परिणाम का असर देशभर में चल रहे समान मामलों पर भी पड़ सकता है।


