मनीषा शर्मा। राजस्थान में होने वाले आगामी पंचायतीराज और निकाय चुनावों से पहले सरकार एक अहम नीति परिवर्तन पर विचार कर रही है। चर्चा है कि दो से अधिक संतान वाले जनप्रतिनिधियों पर चुनाव लड़ने की रोक को लेकर सरकार जल्द ही बड़ा निर्णय ले सकती है। यह रोक राज्य में वर्ष 1995 में लागू की गई थी, जिसके तहत दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति पंचायत या नगर निकाय चुनाव नहीं लड़ सकते थे। अब तीन दशक बाद, बदलते सामाजिक और जनसंख्या परिदृश्यों को देखते हुए सरकार इस नीति पर पुनर्विचार (Policy Review) की तैयारी में है। इस कदम से न केवल राज्य की स्थानीय राजनीति का स्वरूप बदल सकता है, बल्कि जनसंख्या नियंत्रण के संदर्भ में भी एक नया दृष्टिकोण सामने आ सकता है।
कैसे शुरू हुआ यह मुद्दा – 1995 की नीति पर पुनर्विचार
राजस्थान में 1995 में तत्कालीन सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह नियम लागू किया था कि यदि किसी व्यक्ति के दो से अधिक संतानें हैं, तो वह ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद या नगर निकाय चुनावों में उम्मीदवार नहीं बन सकता। इस नियम के पीछे का उद्देश्य था — परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करना और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व में जिम्मेदारी की भावना को बढ़ाना। लेकिन वर्षों से इस कानून को लेकर विवाद और विरोध जारी रहा है। कई बार इसे भेदभावपूर्ण और असंगत बताया गया, क्योंकि यह केवल स्थानीय निकायों पर लागू होता है, जबकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है।
सरकार के संकेत: नीति समीक्षा पर चल रहा परीक्षण
राज्य के शहरी विकास एवं स्वायत्त शासन मंत्री (UDH Minister) झाबर सिंह खर्रा ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि सरकार इस नीति की समीक्षा पर गंभीरता से विचार कर रही है। उन्होंने बताया कि सरकार को कई जनप्रतिनिधियों और संगठनों से ज्ञापन प्राप्त हुए हैं, जिनमें इस नीति को बदलने या समाप्त करने की मांग की गई है।
इस पर अब परीक्षण और समीक्षा (Policy Examination) चल रही है। खर्रा ने स्पष्ट कहा — “जब लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ऐसी कोई रोक नहीं है, तो केवल पंचायत और निकाय चुनावों में यह भेदभाव क्यों? सरकार जनता की मांगों को गंभीरता से देख रही है, और मुख्यमंत्री जल्द ही इस पर निर्णय लेंगे।” इस बयान से यह साफ संकेत मिलते हैं कि राज्य सरकार दो संतान नीति में संशोधन या छूट देने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
राजनीतिक समीकरणों पर बड़ा असर संभव
यदि सरकार इस नीति को हटाने या शिथिल करने का निर्णय लेती है, तो यह राज्य की स्थानीय राजनीति के स्वरूप को बदल सकता है। वर्तमान में, इस प्रतिबंध के कारण बड़ी संख्या में ऐसे संभावित उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ पाते जिनके परिवार में दो से अधिक संतानें हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह रोक हटती है, तो यह न केवल हजारों आकांक्षी उम्मीदवारों के लिए राहत लेकर आएगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ेगा। यह फैसला विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में प्रभाव डाल सकता है, जहां पारंपरिक रूप से बड़े परिवार आम हैं।
जनसंख्या नियंत्रण कानून की व्याख्या पर नया दृष्टिकोण
राजस्थान सरकार का यह कदम देशभर में जनसंख्या नियंत्रण कानूनों की व्याख्या को लेकर नई बहस छेड़ सकता है। अब तक “दो बच्चे नीति” को सामाजिक जिम्मेदारी और परिवार नियोजन की दृष्टि से देखा जाता रहा है। लेकिन यदि राजस्थान इस नीति में संशोधन करता है, तो यह दृष्टिकोण बदल सकता है — अब ध्यान इस बात पर दिया जाएगा कि राजनीतिक पात्रता का आधार केवल संतान संख्या नहीं, बल्कि व्यक्ति की योग्यता, नेतृत्व क्षमता और जनसेवा की निष्ठा होनी चाहिए। कई विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियम अब समय के साथ अप्रासंगिक (Outdated) हो चुका है, क्योंकि भारत की जनसंख्या वृद्धि दर पिछले दो दशकों में काफी स्थिर हो गई है।
भेदभाव के खिलाफ तर्क
इस नीति के विरोध में सबसे प्रमुख तर्क यह रहा है कि यह केवल स्थानीय स्तर के चुनावों पर लागू होती है, जबकि संसद और विधानसभा के लिए कोई ऐसी पाबंदी नहीं है। विरोधियों का कहना है कि जब देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या सांसद बनने के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है, तो गांव के सरपंच या नगर पार्षद बनने पर यह पाबंदी क्यों लगाई जाए। यह भेदभाव स्थानीय प्रतिनिधियों की संवैधानिक समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसके अलावा, कई सामाजिक संगठनों ने भी यह तर्क दिया है कि परिवार नियोजन को कानूनी प्रतिबंध नहीं बल्कि शिक्षा, जागरूकता और सशक्तिकरण के माध्यम से बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
नीति में बदलाव से हो सकता है सामाजिक संतुलन
यदि राजस्थान सरकार इस नीति में संशोधन करती है, तो इससे कई सामाजिक और राजनीतिक समूहों में संतुलन स्थापित हो सकता है। कई समुदायों में पारिवारिक संरचना बड़ी होती है, और इस नियम के चलते वे राजनीतिक प्रक्रिया से वंचित रह जाते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं के लिए यह बदलाव सकारात्मक अवसर साबित हो सकता है। क्योंकि कई महिलाएं, जो सामाजिक रूप से सक्रिय हैं, केवल “दो बच्चे” की शर्त के कारण पंचायत चुनावों में भाग नहीं ले पातीं। ऐसे में नई नीति उनके लिए राजनीतिक सशक्तिकरण का मार्ग खोल सकती है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की भूमिका निर्णायक
यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने संकेत दिए हैं कि अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा लिया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे पर सरकार के भीतर विभिन्न विभागों से राय-मशविरा (Inter-Departmental Consultation) चल रहा है। संभावना है कि मुख्यमंत्री जल्द ही इस नीति पर अंतिम फैसला लेकर राज्य मंत्रिमंडल (Cabinet) में प्रस्ताव लाएंगे। यदि यह निर्णय चुनावों से पहले आता है, तो यह राजनीतिक रूप से भी अहम साबित हो सकता है, क्योंकि इससे राज्य में बड़ी संख्या में नए उम्मीदवारों को चुनावी अवसर मिलेगा।


