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राजस्थान हाईकोर्ट ने ईंट भट्ठा मालिकों पर लगाया गया पर्यावरण मुआवजा रद्द किया

राजस्थान हाईकोर्ट ने  ईंट भट्ठा मालिकों पर लगाया गया पर्यावरण मुआवजा रद्द किया

मनीषा शर्मा।  राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसले में राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) द्वारा 56 ईंट भट्ठा मालिकों पर लगाए गए पर्यावरण मुआवजे (Environmental Compensation) को पूरी तरह रद्द कर दिया है। इस फैसले से प्रदेश के ईंट भट्ठा उद्योग को बड़ी राहत मिली है, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास ऐसा मुआवजा वसूलने का कोई वैधानिक (Statutory) अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल ने 30 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया और आदेश दिया कि जिन ईंट भट्ठा मालिकों से कोई राशि वसूली गई है, उन्हें छह सप्ताह के भीतर वह राशि लौटाई जाए।

मामला कैसे शुरू हुआ: श्रीगंगानगर की कंपनी ने लगाई थी याचिका

यह मामला श्रीगंगानगर जिले के अनूपगढ़ तहसील की टाटा ब्रिक्स कंपनी से शुरू हुआ, जिसके मालिक जितिन कुमार ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। उन्होंने बताया कि उन्होंने 26 नवंबर 2021 को अपने ईंट भट्ठे को संचालित करने के लिए RSPCB से “Consent to Operate” के लिए आवेदन किया था। बोर्ड ने 13 फरवरी 2022 को उन्हें 31 अक्टूबर 2031 तक के लिए संचालन की सहमति दी। लेकिन इसके तुरंत बाद 19 जनवरी 2022 को बोर्ड ने उन्हें शो कॉज नोटिस जारी किया और 8 मार्च 2022 को 15.60 लाख रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगा दिया। जितिन कुमार ने इस आदेश को मनमाना और गैरकानूनी बताते हुए अदालत में चुनौती दी।

56 अन्य ईंट भट्ठा मालिक भी पहुंचे कोर्ट

टाटा ब्रिक्स कंपनी के बाद राजस्थान के अलग-अलग जिलों के 56 अन्य ईंट भट्ठा मालिकों ने भी इसी तरह के आदेशों को चुनौती दी। इनमें सागर ब्रिक्स, तारा ब्रिक्स इंडस्ट्री, श्री महादेव ईंट उद्योग, जय श्री कृष्णा ईंट उद्योग, श्री गुरुनानक ब्रिक्स, बालाजी सप्लायर्स, कमल ईंट उद्योग और कई अन्य कंपनियां शामिल थीं। सभी याचिकाओं में समान रूप से यह तर्क दिया गया कि बोर्ड ने मुआवजा लगाने का निर्णय किसी वैधानिक प्रावधान या अधिनियम के तहत नहीं बल्कि केवल अपने आंतरिक दिशा-निर्देशों के आधार पर लिया था, जो कानून के दायरे में नहीं आता।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का हवाला

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दलील में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 4 अगस्त 2025 को दिए गए एक अहम निर्णय का हवाला दिया। यह निर्णय D.P.C.C. बनाम लोधी प्रॉपर्टी कंपनी लिमिटेड मामले में आया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (State Pollution Control Board) बिना किसी विधायी नियामक तंत्र (Legislative Framework) के पर्यावरण मुआवजा नहीं लगा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी भी बोर्ड को मुआवजा लगाने या वसूलने की शक्ति तभी दी जा सकती है जब उस प्रक्रिया को अधीनस्थ कानून (Subordinate Legislation) के तहत विस्तार से परिभाषित किया गया हो और उसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principles of Natural Justice) शामिल हों। याचिकाकर्ताओं ने इसी सिद्धांत के आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट से मांग की कि RSPCB द्वारा लगाया गया मुआवजा असंवैधानिक और अवैध है।

हाईकोर्ट ने कहा – RSPCB के पास मुआवजा लगाने का अधिकार नहीं

न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल ने अपने विस्तृत आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का गहन विश्लेषण किया और कहा कि राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास पर्यावरण मुआवजा लगाने का कोई वैधानिक आधार नहीं है। उन्होंने कहा कि “बोर्ड द्वारा पर्यावरण मुआवजे की गणना के लिए जो तंत्र अपनाया गया है, वह केवल दिशानिर्देशों पर आधारित है और उसका कोई कानूनी समर्थन नहीं है।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक राज्य सरकार स्पष्ट और कानूनी नियम नहीं बनाती, तब तक बोर्ड को मुआवजा लगाने का अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने दिया पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect)

हालांकि बोर्ड की यह मांग 2022-23 में उठाई गई थी और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अगस्त 2025 में आया, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक फैसले आमतौर पर पूर्वव्यापी रूप से प्रभावी होते हैं, जब तक कि न्यायालय स्वयं यह न कहे कि निर्णय केवल भविष्य के लिए लागू होगा। जस्टिस बेनीवाल ने अपने आदेश में कनिष्क सिन्हा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालतों के निर्णयों का प्रभाव उन सभी मामलों पर पड़ता है, जो समान परिस्थिति में लंबित हों। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का 2025 का फैसला भी इन याचिकाओं पर लागू होगा।

कोर्ट का निर्णायक आदेश: सभी नोटिस और आदेश रद्द

अदालत ने सभी 56 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए स्पष्ट आदेश दिया — सभी विवादित नोटिस, आदेश और पत्राचार को रद्द किया जाता है। यदि किसी याचिकाकर्ता से कोई राशि वसूली गई है, तो उसे आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर लौटाया जाए। यदि राशि वसूली नहीं गई है, तो बोर्ड आगे कोई कार्रवाई न करे। यह आदेश ईंट भट्ठा मालिकों के लिए न केवल आर्थिक राहत है, बल्कि भविष्य में ऐसी मनमानी कार्रवाई पर अंकुश लगाने वाला एक नजीर (Precedent) भी बन गया है।

कोर्ट की टिप्पणी – सरकार पहले बनाए नियम, फिर लगाए मुआवजा

फैसले में हाईकोर्ट ने भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य सरकार वास्तव में पर्यावरण मुआवजा व्यवस्था लागू करना चाहती है, तो उसे पहले इसके लिए स्पष्ट और वैधानिक नियम-कानून (Legal Framework) तैयार करने होंगे।

इन नियमों में यह तय होना चाहिए कि —

  • मुआवजा लगाने का आधार और तरीका क्या होगा,

  • उसकी गणना का फॉर्मूला क्या होगा,

  • और मुआवजा लगाने से पहले संबंधित व्यक्ति या संस्था को सुनवाई का अवसर (Right to Hearing) अवश्य दिया जाए। तभी ऐसी व्यवस्था न्यायसंगत और वैध मानी जाएगी।

कानूनी और औद्योगिक क्षेत्र में फैसले का असर

इस निर्णय के बाद राजस्थान सहित अन्य राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की नीतियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। कई राज्यों में भी बोर्ड द्वारा औद्योगिक इकाइयों पर पर्यावरण मुआवजा लगाने की प्रक्रिया को लेकर विवाद हैं। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद संभावना है कि सरकारें अब ऐसे मामलों में स्पष्ट अधिनियम या नियमावली बनाने पर विचार करेंगी, ताकि भविष्य में कानूनी विवाद न हों। ईंट भट्ठा उद्योग, जो पहले से ही आर्थिक दबाव में है, अब इस राहत भरे फैसले से कुछ हद तक स्थिरता महसूस करेगा।

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