शोभना शर्मा। राजस्थान में कांग्रेस पार्टी के संगठन सृजन अभियान ने जिस उद्देश्य के साथ शुरुआत की थी, वह अब अपने ही भीतर गहराती गुटबाजी का मंच बनता जा रहा है। पार्टी के जिलाध्यक्षों के चयन के लिए चल रही रायशुमारी प्रक्रिया अब “रायशुमारी” से ज्यादा “रारशुमारी” का रूप ले चुकी है।
राज्यभर में चल रही इन बैठकों में नेताओं के बीच खींचतान, आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति प्रदर्शन ने पार्टी की एकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नेताओं के भाषण बने विवाद की जड़
एआईसीसी (AICC) द्वारा भेजे गए पर्यवेक्षक इन बैठकों की निगरानी कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर नेताओं की राय लेकर जिलाध्यक्षों की नियुक्ति करना है। लेकिन कई जिलों में मंच पर बैठने वाले वरिष्ठ नेताओं के भाषण ही विवाद की वजह बन रहे हैं।
मंच से दिए जा रहे बयान पार्टी के अंदर की खींचतान को खुलकर उजागर कर रहे हैं।
कई जिलों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि रायशुमारी बैठकों के दौरान ही कार्यकर्ताओं के बीच नारेबाजी, विरोध और कटाक्ष देखने को मिले। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस का यह अभियान संगठन को सुदृढ़ करने की बजाय उसे और विभाजित करता नजर आ रहा है।
अजमेर, कोटा और झुंझुनूं में बढ़ा तनाव
राजस्थान के अजमेर, कोटा और झुंझुनूं जिले इन दिनों कांग्रेस की आंतरिक राजनीति के केंद्र बने हुए हैं। इन जिलों में आयोजित रायशुमारी बैठकों में नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
झुंझुनूं जिले के नवलगढ़ और खेतड़ी क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं के बीच टकराव तक की नौबत आ गई। वहीं अजमेर में स्थानीय नेताओं के बीच मंच साझा करने को लेकर असहमति खुलकर सामने आई।
कोटा में भी कुछ वरिष्ठ नेताओं ने मंच से दिए अपने भाषणों में एक-दूसरे पर अप्रत्यक्ष कटाक्ष किए, जिससे माहौल और गरम हो गया।
जोधपुर में गहलोत के नाम पर बयानबाजी
जोधपुर जिले की बैठक में तो एक स्थानीय नेता ने पर्यवेक्षक से साफ कहा कि “यहां तो अध्यक्ष का नाम पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही तय करते हैं।” इस बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी।
गहलोत खेमे और पायलट खेमे के बीच चल रही पुरानी खींचतान एक बार फिर सतह पर आ गई। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संगठन सृजन अभियान गुटबाजी को खत्म करने की बजाय पुराने मतभेदों को और उभारने का काम कर रहा है।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी: रायशुमारी में राय किसकी?
कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि जब मंच पर वरिष्ठ नेता ही कब्जा किए हुए हैं, तो आम कार्यकर्ता अपनी राय कैसे रखेगा।
हालांकि, एआईसीसी के पर्यवेक्षकों का दावा है कि वे बैठक के बाद व्यक्तिगत स्तर पर भी कार्यकर्ताओं से बातचीत कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि चर्चाएं ज्यादातर वरिष्ठ नेताओं के दायरे तक ही सीमित रह जाती हैं।
पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि रायशुमारी केवल औपचारिकता बनकर रह गई है और कई जिलों में पहले से तय नामों को ही मंजूरी दी जा रही है।
तीन जिलों के पर्यवेक्षक बदले, अटकलों का दौर तेज
इस बीच, एआईसीसी ने प्रदेश में नियुक्त 30 पर्यवेक्षकों में से तीन जिलों — चित्तौड़गढ़, झालावाड़ और धौलपुर-करौली — के पर्यवेक्षकों को बदल दिया है।
इस बदलाव को लेकर कांग्रेसजनों में कयासों का दौर जारी है। कुछ इसे प्रशासनिक कारणों से लिया गया निर्णय बता रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यह उन जिलों में बढ़ती असहमति और कामकाज को लेकर असंतोष का नतीजा है।
इन बदलावों से यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि पार्टी हाईकमान इस अभियान को लेकर गंभीर है और किसी भी स्तर पर असंतुलन नहीं देखना चाहता।
कांग्रेस नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती
कांग्रेस का संगठन सृजन अभियान जिस उद्देश्य से शुरू किया गया था, वह था पार्टी को जमीनी स्तर पर फिर से सक्रिय करना और कार्यकर्ताओं की राय के आधार पर संगठन को मजबूत बनाना। लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि यह प्रक्रिया पार्टी में संवाद के बजाय दूरी बढ़ा रही है।


