शोभना शर्मा। जयपुर के एसएमएस अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में लगी आग के बाद राज्यभर के अस्पतालों में सुरक्षा समीक्षा के आदेश जारी किए गए थे, लेकिन दौसा जिला मुख्यालय स्थित रामकरण जोशी चिकित्सालय में मंगलवार को जब फायर सेफ्टी की हकीकत जांची गई, तो गंभीर लापरवाही उजागर हुई।
जांच में पाया गया कि अस्पताल के अधिकांश वार्डों में अग्निशमन सिलेंडर खाली पड़े हैं और उन पर वर्ष 2022 की अंतिम रीफिलिंग तारीख दर्ज है। वहीं, आग लगने की स्थिति में पानी सप्लाई करने वाली फायर लाइनें भी लंबे समय से बंद पड़ी मिलीं।
2022 से रीफिल नहीं हुए सिलेंडर, ट्रॉमा वार्ड में भी खाली मिले
अस्पताल के ट्रॉमा वार्ड सहित सभी प्रमुख विभागों में लगाए गए अग्निशमन यंत्र सिर्फ औपचारिकता के रूप में मौजूद हैं। जांच में सामने आया कि सभी सिलेंडर 2022 के बाद रीफिल नहीं किए गए हैं। ट्रॉमा वार्ड, जो कि आपात स्थिति का सबसे संवेदनशील विभाग है, वहां भी खाली सिलेंडर टंगे मिले। सिलेंडरों पर लगी रीफिलिंग तिथि तक मिट चुकी थी और किसी भी अधिकारी ने इन्हें दोबारा भरवाने की पहल नहीं की। यह स्थिति न केवल अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि हजारों मरीजों और स्टाफ की सुरक्षा को भी जोखिम में डाल रही है।
बंद पड़ी फायर लाइनें और निष्क्रिय आपात व्यवस्था
अस्पताल के ओपीडी, आईसीयू, इमरजेंसी, जनाना वार्ड और पोर्च क्षेत्रों में फायर लाइन पाइप सिस्टम तो मौजूद हैं, लेकिन उनकी स्थिति बेहद खराब है। जांच में पाया गया कि पानी की मोटरें महीनों से बंद हैं और पाइपलाइनें भी जाम हो चुकी हैं। आपात स्थिति में आग बुझाने के लिए जिन हाइड्रेंट पाइंट्स की आवश्यकता होती है, वे निष्क्रिय हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अस्पताल में आग जैसी कोई दुर्घटना घटती है, तो इन व्यवस्थाओं का उपयोग असंभव रहेगा।
चार हजार मरीजों का इलाज, सुरक्षा इंतजाम नाकाफी
रामकरण जोशी चिकित्सालय दौसा जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। यहां प्रतिदिन औसतन चार हजार से अधिक मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। अस्पताल में मेडिकल, सर्जरी, जनाना, शिशु, अस्थि, नेत्र और आईसीयू जैसे कई वार्ड संचालित हैं। इतनी बड़ी संख्या में मरीजों और स्टाफ की मौजूदगी के बावजूद अग्निशमन के बुनियादी इंतजाम न होना गंभीर चिंता का विषय है। फायर उपकरणों की निष्क्रियता और सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनुपालना न करना प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है।
अधिकारियों के पास जवाब नहीं, दावा और हकीकत में अंतर
जब इस मामले में अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी डॉ. आर.के. मीणा से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने दावा किया कि “अस्पताल में फायर सेफ्टी के पुख्ता प्रबंध हैं और फायर कर्मचारियों को नियमित जांच के निर्देश दिए गए हैं।” लेकिन जब उनसे ट्रॉमा वार्ड में खाली सिलेंडर की जानकारी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी। उन्होंने आश्वासन दिया कि वार्ड प्रभारी से रिपोर्ट लेकर सभी सिलेंडर रीफिल कराए जाएंगे और फायर लाइन एवं बिजली व्यवस्था की मरम्मत के लिए पीडब्ल्यूडी विभाग को पत्र भेजा गया है।
प्रशासन की समीक्षा अधूरी, लापरवाही बरकरार
जयपुर के एसएमएस अस्पताल में आग की घटना के बाद राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने सभी अस्पतालों में सुरक्षा मानकों की समीक्षा के आदेश दिए थे। हालांकि दौसा के इस प्रमुख अस्पताल में हालात बताते हैं कि न तो कोई मॉक ड्रिल हुई और न ही फायर उपकरणों की जांच। अस्पताल प्रशासन ने केवल कागजों में रिपोर्ट पूरी कर दी, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं हुआ। फायर लाइनें, खाली सिलेंडर और निष्क्रिय मोटरें इस बात की गवाही दे रही हैं कि अस्पताल किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार नहीं है।
फायर सेफ्टी की अनदेखी से बड़ा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि अस्पतालों में फायर सेफ्टी मानकों की अनदेखी मरीजों और स्टाफ दोनों के जीवन के लिए खतरा बन सकती है। एसएमएस अस्पताल में हुई आग की घटना इस बात का उदाहरण है कि थोड़ी-सी चूक से बड़ा हादसा हो सकता है। अगर दौसा के रामकरण जोशी अस्पताल में इसी तरह की स्थिति बनी रही, तो किसी भी समय बड़ी दुर्घटना घट सकती है। फायर डिपार्टमेंट के अधिकारियों का कहना है कि अस्पताल प्रबंधन को हर तीन महीने में फायर सिस्टम की जांच करानी चाहिए, लेकिन यहां पिछले दो सालों से कोई निरीक्षण नहीं हुआ।
कानूनी मानकों की अनदेखी
राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC) और राज्य सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार, हर सरकारी अस्पताल को फायर सेफ्टी ऑडिट रिपोर्ट हर वर्ष तैयार करनी होती है। साथ ही, फायर एक्सटिंग्विशर की रीफिलिंग हर छह महीने में अनिवार्य है। लेकिन दौसा के इस अस्पताल में न तो कोई वार्षिक रिपोर्ट तैयार हुई और न ही सिलेंडर भरवाए गए। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि सुरक्षा नियमों की न तो पालन की जा रही है, न ही किसी अधिकारी को इसकी चिंता है।
सबक नहीं ले रहा प्रशासन
जयपुर के एसएमएस अस्पताल में आग लगने की घटना ने पूरे राजस्थान को झकझोर दिया था, लेकिन दौसा के रामकरण जोशी चिकित्सालय की स्थिति बताती है कि जिम्मेदारों ने कोई सबक नहीं लिया। खाली सिलेंडर, बंद फायर लाइनें और निष्क्रिय सिस्टम यह दर्शाते हैं कि अस्पताल प्रशासन सिर्फ औपचारिकताओं तक सीमित है। जबकि यहां प्रतिदिन हजारों मरीज इलाज के लिए आते हैं, जिनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
राज्य सरकार और जिला प्रशासन को चाहिए कि इस अस्पताल की तत्काल फायर सेफ्टी ऑडिट कराए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे, ताकि भविष्य में किसी बड़ी दुर्घटना को रोका जा सके।


