मनीषा शर्मा। राजस्थान की राजधानी जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में शनिवार देर रात लगी आग ने भयावह रूप ले लिया। इस हादसे में आठ मरीजों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से प्रभावित हुए। घटना के बाद अस्पताल प्रशासन, सुरक्षा व्यवस्था और फायर फाइटिंग सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रशासनिक जांच में शुरुआती तौर पर तीन प्रमुख कारण सामने आए हैं, जिनकी वजह से आग तेजी से फैली और आईसीयू में भर्ती मरीजों की जान नहीं बचाई जा सकी।
हादसे के तीन मुख्य कारण
1. स्मॉक अलार्म ने समय पर काम नहीं किया
सूत्रों के अनुसार, ट्रॉमा सेंटर के स्टोर रूम में लगा स्मॉक डिटेक्टर आग लगने के बाद समय पर एक्टिवेट नहीं हुआ। अलार्म सिस्टम में देरी के कारण शुरुआती आग का किसी को पता नहीं चला। आग धीरे-धीरे फैलती गई और उसका धुआं पूरे न्यूरोसर्जरी आईसीयू वार्ड तक पहुंच गया। जब तक स्टाफ और मरीजों के परिजन धुएं से परेशान होकर बाहर निकलने लगे, तब तक स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी। हालांकि अस्पताल प्रशासन का दावा है कि स्मॉक अलार्म समय पर बजा, और उसी के बाद स्टाफ ने रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अलार्म काफी देरी से सक्रिय हुआ, जिससे मूल्यवान समय नष्ट हो गया।
2. वार्ड को स्टोर रूम में बदलने की लापरवाही
जिस कमरे से आग की शुरुआत हुई, वह वास्तव में आईसीयू वार्ड का हिस्सा था। यहां मरीजों के बेड लगाए जाने थे, लेकिन बाद में स्टाफ ने इसे स्टोर रूम में बदल दिया। रिपोर्ट के अनुसार, इस कमरे में दवाइयों के बॉक्स, गत्ते, प्लास्टिक कंटेनर और पुराने दस्तावेजों का ढेर लगा था। इन ज्वलनशील वस्तुओं के कारण आग तेजी से भड़क उठी और कुछ ही मिनटों में पूरे आईसीयू में फैल गई। इस अव्यवस्थित भंडारण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ने आग को विकराल रूप देने में अहम भूमिका निभाई।
3. पुरानी तकनीक का फायर फाइटिंग सिस्टम
ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू में पुराने प्रकार का फायर फाइटिंग सिस्टम स्थापित था। यहां ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर सिस्टम की जगह मेनुअल वाटर सप्लाई सिस्टम लगाया गया था।
आग लगने के तुरंत बाद पानी की आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी क्योंकि मेनुअल सिस्टम को चालू करने की प्रक्रिया जटिल थी और स्टाफ को इसकी पूरी जानकारी नहीं थी। सुरक्षा गार्ड और तकनीकी कर्मचारियों को यह भी पता नहीं था कि पानी की लाइन कहां से सक्रिय करनी है। परिणामस्वरूप, आग तेजी से बढ़ी और आईसीयू वार्ड को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया।
11 मरीजों में से 5 को बचाया गया
एसएमएस अस्पताल के प्रिंसिपल डॉ. दीपक माहेश्वरी ने बताया कि न्यूरोसर्जरी आईसीयू में कुल 11 बेड की क्षमता है, और हादसे के समय सभी बेड पर गंभीर मरीज भर्ती थे।
अग्निशमन दल और अस्पताल स्टाफ ने मिलकर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, जिसमें 5 मरीजों को सुरक्षित बाहर निकाला गया, जबकि 8 मरीजों की धुएं और आग के कारण मौत हो गई। फायर ब्रिगेड की कई गाड़ियां मौके पर पहुंचीं, लेकिन तब तक आग काफी फैल चुकी थी। धुआं पूरे वार्ड में भर गया, जिससे मरीजों का दम घुटने से निधन हो गया।
फायर सेफ्टी प्रोटोकॉल पर गंभीर सवाल
यह हादसा एक बार फिर अस्पतालों की फायर सेफ्टी व्यवस्था पर गहरी चिंता पैदा करता है। सूत्रों का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर में फायर सिस्टम की वार्षिक मेंटेनेंस जांच कई महीनों से नहीं हुई थी। साथ ही, स्टाफ को आपातकालीन हालात से निपटने के लिए फायर ड्रिल प्रशिक्षण भी लंबे समय से नहीं दिया गया था। अस्पताल में लगाए गए स्मॉक सेंसर, स्प्रिंकलर और अलार्म सिस्टम में से कई तकनीकी रूप से पुराने और खराब स्थिति में थे। इस लापरवाही का खामियाजा मरीजों की जान से चुकाना पड़ा।
प्रशासन ने की जांच शुरू
घटना के बाद राजस्थान स्वास्थ्य विभाग और जयपुर जिला प्रशासन ने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। मुख्य सचिव ने फायर सेफ्टी सिस्टम, मेंटेनेंस रजिस्टर, स्टाफ प्रशिक्षण रिकॉर्ड और ऑडिट रिपोर्ट की जांच के निर्देश दिए हैं। वहीं, मृतकों के परिजनों ने आरोप लगाया कि अगर अस्पताल में आधुनिक फायर सिस्टम और सतर्कता होती, तो इनकी जानें बचाई जा सकती थीं।
सुरक्षा मानकों में लापरवाही – एक चेतावनी
एसएमएस अस्पताल राजस्थान का सबसे बड़ा सरकारी चिकित्सा केंद्र है, जहां रोज़ हजारों मरीज इलाज के लिए आते हैं। ऐसे में इस तरह की दुर्घटना ने राज्य के स्वास्थ्य तंत्र और सुरक्षा प्रबंधन पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अस्पतालों में नियमित फायर ऑडिट, सिमुलेशन ड्रिल और फायर अलार्म टेस्टिंग की व्यवस्था हो, तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।


