शोभना शर्मा। राजस्थान हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग द्वारा दिव्यांग कर्मचारियों की सेवा समाप्ति पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि कम दिव्यांगता प्रतिशत को आधार बनाकर बिना नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए की गई बर्खास्तगी विधिक प्रक्रिया और सेवा नियमों के खिलाफ है। अदालत ने विभाग का आदेश रद्द करते हुए तीन दिव्यांग कर्मचारियों को पुनः सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने माना आदेश अवैध
हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षा विभाग का यह कदम न तो राजस्थान सेवा नियम (CCA रूल्स) के अनुसार है और न ही विधिक प्रक्रिया के अनुरूप। इसलिए बर्खास्तगी को रद्द किया जाता है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सरकार चाहे तो नियमों और तय प्रक्रिया का पालन करते हुए आगे की कार्रवाई कर सकती है। यह फैसला न केवल तीन कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया है बल्कि उन सभी दिव्यांग कर्मचारियों के लिए उम्मीद जगाने वाला है जिनकी सेवाओं को हाल ही में पुनः जांच के आधार पर खतरे में डाला गया था।
मामला क्या था?
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता रामप्रताप सैनी ने बताया कि तीनों कर्मचारी अलवर जिले के अलग-अलग सरकारी विद्यालयों में कार्यरत थे। उनकी नियुक्ति वैध दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर दिव्यांग कोटे में की गई थी। लेकिन बाद में शिक्षा विभाग ने उन्हें जयपुर के एमएमएस अस्पताल में पुनः जांच के लिए भेजा। इस जांच में उनका दिव्यांगता प्रतिशत पहले से कम बताया गया। विभाग ने इस रिपोर्ट के आधार पर बिना किसी पूर्व नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए उनकी सेवा समाप्त कर दी। कर्मचारियों ने इस निर्णय को मनमाना और नियमों के खिलाफ बताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
सरकार का कदम और पुनः जांच प्रक्रिया
दरअसल, हाल के दिनों में राजस्थान में भर्ती परीक्षाओं में हुई गड़बड़ी और फर्जीवाड़े के मामलों को देखते हुए सरकार ने एक बड़ा निर्णय लिया था। इसके तहत सभी विभागों में कार्यरत दिव्यांग कर्मचारियों की पुनः जांच करवाने का आदेश जारी किया गया।
यह जांच सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के पैनल द्वारा की जा रही है।
कर्मचारियों के प्रस्तुत दस्तावेजों और प्रमाण पत्रों की गहन जांच की जा रही है।
यदि नियुक्ति के समय दिए गए प्रमाण पत्र और वर्तमान रिपोर्ट में प्रतिशत का अंतर नियमानुसार अधिक पाया जाता है तो संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
इसी प्रक्रिया के तहत अलवर के इन तीनों कर्मचारियों की भी पुनः जांच की गई थी और दिव्यांगता प्रतिशत घटने के आधार पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं।
कोर्ट का रुख और असर
हाईकोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि विभाग ने जिस तरह से कार्रवाई की, वह न्यायसंगत और वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। सेवा समाप्त करने से पहले कर्मचारियों को नोटिस देना और पक्ष रखने का अवसर देना आवश्यक था। यह फैसला आने के बाद शिक्षा विभाग और अन्य सरकारी विभागों में कार्यरत दिव्यांग कर्मचारियों में राहत की लहर है। साथ ही, यह भी तय है कि आगे किसी भी तरह की कार्रवाई के लिए विभाग को अब कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
व्यापक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला एक नज़ीर साबित होगा। क्योंकि हाल ही में बड़ी संख्या में दिव्यांग कर्मचारियों की पुनः जांच की जा रही है। ऐसे में यह फैसला सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन न हो। इसके अलावा, यह निर्णय सरकार के लिए भी एक चेतावनी है कि भर्ती और सेवा से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और न्यायसंगत प्रक्रिया का पालन करना बेहद जरूरी है।


