latest-newsदेशराजस्थान

राजस्थान के इन प्राचीन मंदिरों में सालभर उमड़ती आस्था

राजस्थान के इन प्राचीन मंदिरों में सालभर उमड़ती आस्था

मनीषा शर्मा। राजस्थान का जालोर जिला केवल ऐतिहासिक धरोहरों और वीरता की कहानियों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन मंदिर परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां ऐसे कई मंदिर हैं, जहां सालभर देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान इन मंदिरों में विशाल मेले लगते हैं और वातावरण पूरी तरह धार्मिक आस्था से भर जाता है।

इन मंदिरों की मान्यता सिर्फ स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से लेकर विदेशों तक के भक्त यहां दर्शन करने आते हैं। आइए जानते हैं जालोर के उन प्रमुख मंदिरों के बारे में जो सदियों से आस्था का केंद्र बने हुए हैं।

सुंधा माता मंदिर: 900 साल पुरानी आस्था का प्रतीक

जालोर जिले के भिनमल उपखंड में स्थित सुंधा माता मंदिर करीब 900 वर्ष पुराना है। यह मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला की ऊंचाई पर स्थित है और देवी चामुंडा माता को समर्पित है, जिन्हें यहां सुंधा माता कहा जाता है।

मंदिर परिसर में 1262, 1326 और 1727 ईस्वी के शिलालेख मौजूद हैं, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करते हैं। किंवदंती के अनुसार, यह स्थल शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध है क्योंकि यहां देवी सती के अंग गिरे थे।

नवरात्रि के समय यहां विशाल मेला भरता है, जिसमें गुजरात और राजस्थान से लाखों श्रद्धालु आते हैं। विदेशी पर्यटक भी इस मंदिर की भव्यता और पौराणिक महत्व से आकर्षित होकर यहां पहुंचते हैं।

क्षेमकरी माता मंदिर: भीनमल की आस्था

भीनमल कस्बे में स्थित क्षेमकरी माता मंदिर भी आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां देवी क्षेमकरी को खिमज माता के नाम से पूजा जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी ने राक्षस उत्तमौजा का वध कर क्षेत्र को आतंक से मुक्त किया था।

नवरात्रि में इस मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है। हजारों श्रद्धालु माता के दरबार में आकर आशीर्वाद पाते हैं।

चामुंडा माता मंदिर: आहोर की धार्मिक पहचान

आहोर कस्बे में स्थित चामुंडा माता मंदिर भी प्राचीन समय से भक्तों के लिए आस्था का केंद्र रहा है। मान्यता है कि यहां देवी ने राक्षसों का वध किया था और शांति स्थापित की थी।

नवरात्रि में यहां विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। स्थानीय लोग इसे अपने गांव-नगर की सुरक्षा और शांति की प्रतीक मानते हैं।

आशापुरा माता मंदिर: कुलदेवी के रूप में प्रसिद्ध

जालोर जिले के मोदरान गांव में स्थित आशापुरा माता मंदिर विशेष रूप से सोनारा राजपूतों की कुलदेवी के रूप में पूजनीय है। किंवदंती है कि व्यापारी देवचंद शाह ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर इस मंदिर का निर्माण कराया।

यहां नवरात्रि के अवसर पर भव्य सजावट होती है और माता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

इसके अलावा, जालोर किले में स्थित आशापुरा माता का मंदिर भी आस्था का एक और बड़ा केंद्र है। यहां देवी ने राजा की मनोकामना पूरी की थी, जिससे यह स्थल और भी पवित्र माना जाता है।

चौंसठ जोगणियों का मंदिर: 1300 साल पुरानी परंपरा

जालोर के सुंदला तालाब के पास स्थित चौंसठ जोगणियों का मंदिर लगभग 1300 साल पुराना है। यह मंदिर विशेष रूप से जोगी समुदाय के लिए आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां देवी ने जोगियों की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया था।

नवरात्रि में यहां नौ दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना और गरबा महोत्सव आयोजित होता है। यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती है।

नवरात्रि का विशेष महत्व

जालोर जिले के इन सभी मंदिरों में नवरात्रि का पर्व विशेष महत्व रखता है। इस दौरान यहां भव्य मेले, गरबा महोत्सव, और विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।

भक्तों का मानना है कि इन दिनों माता की आराधना से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है। यही कारण है कि इन मंदिरों में केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से भी भक्त बड़ी संख्या में आते हैं।

post bottom ad

Discover more from MTTV INDIA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading